भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

१२० . [ दूसरी पञ्चिका इस बात को समझता है वह गायत्री के द्वारा अपने को पाप और दोष के बुरे परिणाम से बचा लेता है । जिसको स्वर्ग की कामना हो वह हजार मंत्र पढ़े । स्वर्ग यहाँ से घोड़े की एक हजार दिन की यात्रा के बराबर दूर है । स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये ( ऐसा किया जाता है ) । सम्पत्ति और देव-संगम के लिये अपरिमित मंत्र बोले । प्रजापति अपरिमित है । यह जो प्रातरनुवाक है वह प्रजापति का है । उसमें सब कामनायें शामिल हैं । यह जो अपरिमित संख्या में मंत्र बोले जाते हैं वह सब कामनाओं की सिद्धि के लिए बोले जाते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसकी सब कामनायें सिद्ध हो जाती हैं । इसलिये अपरिमित मंत्र बोलने चाहिये । वह अग्नि के लिए सात छन्दों में मंत्र बोलता है । क्योंकि देव- लोक सात हैं । जो इस रहस्य को जानता है वह सब लोकों में सुख पाता है । उषा के लिये सात छन्दों का मंत्र बोलता है । गाँव के पशु सात* होते हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह गाँव के सात पशुओं को प्राप्त होता है । दोनों अश्विनों के लिये सात प्रकार के छन्द बोले जाते हैं । क्योंकि वाणी ने सात प्रकार से बोला । सात प्रकार से वाणी ने बोला । पूर्ण वाणी और पूर्ण ब्रह्म में (यही सात छन्द हैं) । तीन देवताओं के लिये मन्त्र बोलता है । क्योंकि यह तीन लोक तिहरे तिहरे हैं । यह मन्त्र तीनों लोकों की विजय के लिए पढ़े जाते हैं । ( ७ ) १८—इस पर प्रश्न होता है कि प्रातरनुवाक कैसे बोलने चाहिये ? छन्दों के अनुसार बोलने चाहिये । यह जो छन्द हैं वह प्रजापति के अंग हैं । जो यज्ञ करता है वह प्रजापति है । *बकरी, भेड़, गाय, घोड़े, गधे, ऊँट और मनुष्य ।

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 134, कुल 592 में से · BharatKosha