ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
१२० . [ दूसरी पञ्चिका इस बात को समझता है वह गायत्री के द्वारा अपने को पाप और दोष के बुरे परिणाम से बचा लेता है । जिसको स्वर्ग की कामना हो वह हजार मंत्र पढ़े । स्वर्ग यहाँ से घोड़े की एक हजार दिन की यात्रा के बराबर दूर है । स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये ( ऐसा किया जाता है ) । सम्पत्ति और देव-संगम के लिये अपरिमित मंत्र बोले । प्रजापति अपरिमित है । यह जो प्रातरनुवाक है वह प्रजापति का है । उसमें सब कामनायें शामिल हैं । यह जो अपरिमित संख्या में मंत्र बोले जाते हैं वह सब कामनाओं की सिद्धि के लिए बोले जाते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसकी सब कामनायें सिद्ध हो जाती हैं । इसलिये अपरिमित मंत्र बोलने चाहिये । वह अग्नि के लिए सात छन्दों में मंत्र बोलता है । क्योंकि देव- लोक सात हैं । जो इस रहस्य को जानता है वह सब लोकों में सुख पाता है । उषा के लिये सात छन्दों का मंत्र बोलता है । गाँव के पशु सात* होते हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह गाँव के सात पशुओं को प्राप्त होता है । दोनों अश्विनों के लिये सात प्रकार के छन्द बोले जाते हैं । क्योंकि वाणी ने सात प्रकार से बोला । सात प्रकार से वाणी ने बोला । पूर्ण वाणी और पूर्ण ब्रह्म में (यही सात छन्द हैं) । तीन देवताओं के लिये मन्त्र बोलता है । क्योंकि यह तीन लोक तिहरे तिहरे हैं । यह मन्त्र तीनों लोकों की विजय के लिए पढ़े जाते हैं । ( ७ ) १८—इस पर प्रश्न होता है कि प्रातरनुवाक कैसे बोलने चाहिये ? छन्दों के अनुसार बोलने चाहिये । यह जो छन्द हैं वह प्रजापति के अंग हैं । जो यज्ञ करता है वह प्रजापति है । *बकरी, भेड़, गाय, घोड़े, गधे, ऊँट और मनुष्य ।
दूसरा अध्याय ] १२१ यजमान के हित के लिये प्रातरनुवाक पाद पाद करके बोलने चाहिये । पशुओं के चार पाद होते हैं। ( ऐसा करने से ) पशुओं को पाता है। ऋचायें आधी आधी करके बोलनी चाहियें । यह जो इस प्रकार बोलता है प्रतिष्ठा के लिए बोलता है। मनुष्य के दो पाद होते हैं पशु के चार पाद । इस प्रकार वह दो पैर वाले यजमान को चार पैर वाले पशुओं में स्थापना करता है। इसलिए प्रातरनुवाक को आधी आधी ऋचा करके बोलना चाहिये । यहाँ यह प्रश्न होता है कि प्रातरनुवाक तो व्यूह हैं, फिर यह अव्यूह कैसे हो गये ? इसका उत्तर यह है कि *"यदि इसके मध्य से बृहती छन्द चला न जाय”। कुछ देवता आहुतियों में भाग लेते हैं, कुछ स्तोमों ( साम- वेदीय प्रार्थना ) में। कुछ छन्दों में। आहुतियों से उन देवों को प्रसन्न किया जाता है जो आहुतियों में भाग लेने वाले हैं। स्तुति और प्रशंसा से उनको जो स्तोम और छन्दों में भाग लेने वाले हैं। जो इस रहस्य को समझता है उससे दोनों प्रकार के देव सन्तुष्ट रहते हैं।
*छन्दों का साधारण क्रम यह है—गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री में २४ अक्षर होते हैं। उष्णिक् में २८, अनुष्टुप में ३२, बृहती में ३६, पंक्ति में ४०, त्रिष्टुप् में ४४ और जगती में ४८। इस प्रकार हर दूसरे में ४ अक्षर बढ़ जाते हैं। इस क्रमशः बढ़ने को व्यूह्ल कहते हैं। प्रातरनुवाक में छन्दों का क्रम टूट जाता है अर्थात् गायत्री, अनुष्टुप, त्रिष्टुप्, बृहती, उष्णिक्, जगती, पंक्ति। इस प्रकार यह अव्यूह्ल हो गये। इसका उत्तर यह दिया गया है कि 'बृहती' छन्द बीच से उठाया नहीं गया इस लिये व्यूह्ल का अव्यूह्ल हो गया।
१२२ [ दूसरी पञ्चिका तैंतीस देवता सोमपा हैं। ३३ असोमपा । सोमपा यह हैं। आठ वसु, ११ रुद्र, बारह आदित्य, प्रजा- पति, और वषट्कार । असोमपा यह हैं, ११ प्रयाज, ११ अनुयाज, ११ उपयाज ॥ यह पशु में भाग रखते हैं। सोम से सोमपा देवताओं को संतुष्ट करता है और पशु से असोमपा देवताओं को । इस प्रकार जो इस रहस्य को समझता है वह दोनों प्रकार के देवों को सन्तुष्ट कर देता है। वह इस मंत्र से समाप्त करता है :- अभूदुषा रुशत् पशुरग्निरधाय्यृत्वियः। अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ ( ऋ० ५।७५।६ ) ( श्वेत पशु वाली उषा आ गई । ऋतु के अनुकूल अग्नि रख दी गई। हे विचित्र वीरो ( दोनों अश्विनो ) तुम्हारा न मरने वाला रथ जोता जा चुका । हे मधु को प्रिय रखने वाले, तुम दोनों हमारे बुलाने को सुनो ) । इस पर प्रश्न होता है कि यदि अग्नि के, उषा के और अश्विन की तीन ऋचाओं को बोलता है तो यह एक ऋचा बोलने का क्या प्रयोजन है ? इसका उत्तर यह है कि इस ऋचा में तीनों देवों का वर्णन है। "अभूदुषा रुशत् पशुः" यह 'उषा' के लिये । "अग्निरधाय्यृत्वियः" यह अग्नि के लिए । "अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ।” दोनों अश्विनों के लिये । इस प्रकार एक ऋचा से समाप्त करने से तीनों देवों की स्तुति शामिल हो जाती है। (८)
तीसरा अध्याय १९-ऋषियों ने सरस्वती के किनारे सत्र करते हुये कवष को जो इलूषा का पुत्र था यह कह कर सोम यज्ञ से निकाल दिया, "यह दासीपुत्र, ज्वारी, अब्राह्मण हमारे मध्य में दीक्षा को कैसे प्राप्त करेगा।" उन्होंने उसको रेगिस्तान में निकाल दिया कि वह प्यासा मर जाय और सरस्वती का पानी न पी सके। उसने रेगिस्तान में जाकर प्यास से तंग आकर अपोनप्त्रीय मंत्रों को देखा :- "प्रदेवत्रा ब्रह्मणे गातुरेतु... इति" ( ऋ० १०।३० ) ꕤ इस "अपां न पात्" सूक्त में १५ मंत्र हैं जो नीचे दिये जाते हैं - प्र देवत्रा ब्रह्मणे गातुरेत्वपो अच्छा मनसो न प्रयुक्ति । महीं मित्रस्य वरुणस्य धासिं पृथुज्रयसे रीरधा सुवृक्तिम् ॥१॥ अध्वर्यवो हविष्मन्तो हिभूताऽच्छाप इतो शतीरुशन्तः। अव याश्चष्टे अरुणः सुपर्णस्तमास्यध्वमूर्भिमद्या सुहस्ताः ॥२॥ अध्वर्यवोडप इता समुद्र मपां नपातं हविषा यजध्वम् । स वो दददूर्भिमद्या सुपूतं तस्मै सोमं मधुमन्तं सुनोत ॥३॥ ( १२३ )
१२४ [ दूसरी पञ्चिका “ब्राह्मण के लिये देवों तक पहुँचने के लिये रास्ता हो ।” इस प्रकार वह् जलों के ( अपाम् ) प्रियधाम को प्राप्त हो यो अनिध्मो दीदय दप्स्वन्त्यँ विप्रास ईलते अध्वरेषु । अपां नपान्मधुमती रपो दा याभिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय ॥४॥ याभिः सोमो मोदते हर्षते च कल्याणीभिर्युवतिभिर्न मर्यः । ता अध्वर्यो अपो अच्छा परेहि यदासिक्ता ओषधीभिः पुनीतात् ॥५॥ एवेचने युवतयो नमन्त यदीनुशन्नुशतीरेत्यच्छ । सं जानते मनसा संचिकित्रऽध्वर्यवो धिषणापश्च देवीः ॥६॥ यो वो वृताभ्यो अकृणोदु लोकं यो वो मह्या अभिशस्तेरमुञ्चत् । तस्मा इन्द्राय मधुमन्तर्मूर्मिं देवमादनं प्र हिणोतनापः ॥७॥ प्रास्मै हिनोत मधुमन्तमूर्मिं गर्भो यो वः सिन्धवो मध्व उत्सः । घृतपृष्ठमीड्यमध्वरेष्वाऽऽपो रेवतीः शृणुता हवं मे ॥८॥ तं सिन्धवो मत्सरमिद्रपानमूर्म्मिं प्र हेत य उभे इयर्त्ति । मदच्युत मौशानं नभोजां परि त्रितन्तुं विचरन्तमुत्सम् ॥९॥ आवर्त्ततीरध नु द्विधारा गोषुयुधो न नियवं चरन्तीः । ऋषे जनित्रीर्भुवनस्य पत्नीरपो वन्दस्व सवृधः सयोनीः ॥१०॥ हिनोता नो अध्वरं देवयज्या हिनोत ब्रह्म सनये धनानाम् । ऋतस्य योगे विष्यध्वमूहः श्रुष्टीवरीर्भूत नास्मभ्यमापः ॥११॥ आपो रेवतीः क्षयथा हि वस्वः क्रतुं च भद्रं बिभृथामृतं च । रायश्च स्थ स्वपत्यस्य पत्नीः सरस्वती तद्गृणते वयो धात् ॥१२॥ प्रति यदापो अदृशमायतीर्घृतं पयांसि बिभ्रतीर्मधूनि । अध्वर्युभिर्मनसा संविदाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तीः ॥१३॥ एमा अगमन् रेवतीर्जीवधन्या अध्वर्यवः सादयता सखायः । नि बर्हिषि धत्तन सोम्यासोऽपां नप्त्रा संविदानास एनाः ॥१४॥ आगमन्नाप उशतीर्बर्हिरेदं न्यध्वरे असदन् देवयन्तीः । अध्वर्य्यवः सुनुतेन्द्राय सोमयभूदु वः सुशका देवयज्या ॥१५॥ ( ऋ० १०।३० )
तीसरा अध्याय ] १२५ गया । वे उसको मिलने गये। सरस्वती ने उसे चारों ओर से घेर लिया। इसलिये इस स्थान को परिसारक कहते हैं। क्योंकि सरस्वती ने इसको घेर लिया (परि ससार) इसलिये ऋषि कहने लगे कि देवता इसको जानते हैं, लाओ इसे बुला लें । उनको बुलाने के पश्चात् उन्होंने "अपो नप्त्रीयम्" बनाया । अर्थात् "प्र देवत्रा ब्रह्मणे गातुरेतु" इत्यादि । इसके द्वारा उन्होंने जलों के परम धाम को पाया और देवों के परम धाम को भी । जो कोई इस रहस्य को समझता है और जो इस रहस्य को समझ कर 'अपोनप्त्रीय' को करता है वह जलों और देवों के प्रिय धाम को प्राप्त होता है और परम लोक पर विजय पाता है। उसको इसका पाठ निरन्तर करना चाहिये । ऐसा करने से सन्तान के लिये निरन्तर वर्षा होगी । यदि ठहर ठहर कर पढ़ेगा तो सन्तान के लिये बादल भी रुक कर बरसेगा । इसलिए निरन्तर पढ़ना चाहिये । यदि पहली ऋचा को बिना रुके हुये तीन बार बोले तो सभी सूक्त निरन्तर बोला हुआ माना जा सकता है। (१) २०—पहली नौ ऋचायें (१०।३० की) क्रमशः बोलकर ग्यारहवीं ऋचा को दसवीं के स्थान में अर्थात् "हिनोतानोऽअध्वरं देव यज्य" और दसवीं को ग्यारहवीं के स्थान में अर्थात् "आव- वृततीरधु नु द्विधारा" इत्यादि बोले। यह उस समय बोलना चाहिये जब "एकधना" नामक जलों को नदी से लावें । जब होता इन जलों को आता देखे तो कहे :— प्रति यदापो अदृशमायती घृ॒तं पयांसि बिभ्रतीर्मधूनि । अध्वर्यु- भिर्मनसा संविदाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तीः ॥ (ऋ० १०।३०।१३) जब जल आ जावें तो नीचे का मंत्र पढ़े :— आ धेनवः पयसा तूर्यर्था अमर्धन्तीरुप नो यन्तु मध्वा । महो राये बृहतीः सप्तविप्रो मयोभुवो जरिता जोहवीति ॥ (ऋ० ५।४३।१)
१२६ [ दूसरी पञ्चिका जब (वसतीवरि और एकधना जल) मिलाये जायं तो होता यह मंत्र पढ़े :- समन्या यन्त्युप यन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यः पृणन्ति। तन् शूचिं शुचयो दीदिवांसमपां नपातं परि तस्थुरापः ॥ (ऋ० २।३५।३) जो जल पहले दिन लाये जाते हैं उनको "वसतीवरि" और जो उसी दिन प्रातःकाल लाये जाते हैं उनको "एकधन" कहते हैं। ये दोनों जल इस बात पर झगड़ पड़े कि "हम यज्ञ को पहले ले जावें", "हम यज्ञ को पहले ले जावें।" भृगु ने इनको देखा कि झगड़ रहे हैं। उसने इनको ऊपर की ऋचा (ऋ० २।३५।३) से शान्त किया। इससे वह शान्त हो गये। जो इस रहस्य को समझ कर इस प्रकार जलों को शान्त करता है वह इसी प्रकार यज्ञ को पहले ले जायेगा। होता के चमसे में 'वसतीवरी और एकधना जलों के डालने पर यह मन्त्र पढ़ता है :- आपो न देवीरुप यन्ति होत्रियमवः पश्यन्ति विततं यथा रजः । प्राचैर्देवासः प्रणयन्ति देवयुं ब्रह्मप्रियं जोषयन्ते वरा इव । (ऋ० १०।८३।२) अब होता अध्वर्यु से पूछता है, "क्या तुमको जल मिल गये ?" जल ही यज्ञ है। इस प्रश्न से तात्पर्य यह है कि "क्या यज्ञ मिल गया ?" इस पर अध्वर्यु उत्तर देता है, "मिल गये। देख लो।" (अब होता अध्वर्यु से कहता है :-) "हे अध्वर्यु इन जलों से तुम इन्द्र के लिये मधु-सहित सोम को जो वर्षा लाने वाला और तीव्रान्त अर्थात् शुभ परिणाम वाला है। बीच में अन्य कृत्य करके निचोड़ो। वह इन्द्र कैसा है ? वसु वाला, रुद्र वाला, आदित्य वाला, ऋभु वाला, विभु वाला, अन्न वाला, बृहस्पति वाला, और विश्व-देव वाला, यह (आठ
तीसरा अध्याय ] १२७ इन्द्र के विशेषण हैं )। जिस ( सोम ) को पीकर इन्द्र ने वृत्रों को मारा और शत्रुओं को पराजित किया । ओ३म् ।” यह कह कर होता अपनी जगह से उठता है । उठकर जलों का सम्मान करता है जैसे जब कोई प्रतिष्ठित पुरुष निकट आता है तो उठ कर सम्मान करते हैं । इसलिये उठ कर और सामने मुँह करके जलों का सम्मान किया जाता है । इसी प्रकार प्रतिष्ठित पुरुष का सम्मान करते हैं । इसलिये होता को सम्मानार्थ जलों के पीछे जाना चाहिये । यदि दूसरा कोई भी यज्ञ करे तो भी होता यश प्राप्ति के समर्थ है । इसलिये मंत्र पढ़ने वाले को जलों के पीछे जाना चाहिये । उनके पीछे जाते हुये उसे यह मंत्र बोलना चाहिये :- अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम् । पृञ्चतीर्मधुना पयः ॥ ( ऋ० १।२३।१६ ) जो यश की कामना करे वह यह मंत्र पढ़े । जो तेज या ब्रह्मवर्चस् की कामना करे वह यह मंत्र पढ़े :- अमूर्या उपसूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह । ता नो हिन्वन्त्वध्वरम् ॥ ( ऋ० १।२३।१७ ) जो पशु की कामना हो तो यह मंत्र पढ़े :- अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः । सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः ॥ ( ऋ० १।२३।१८ ) जो इनको पढ़ता हुआ जलों के पीछे जायगा वह अवश्य ही इन कामनाओं की पूर्ति करेगा । जो इस रहस्य को समझता है वह इसे इन कामनाओं को पा लेता है । जब वसतीवरी और एकधना जल वेदी पर रखे जा रहे हैं तब वह यह मंत्र पढ़ता है :-
१२८ [ दूसरी पञ्चिका एमा अग्मन् रेवतीर्जीवधन्या अध्वर्यवः सादयता सखायः । नि बर्हिषि धत्तन सोम्यासोऽपां नप्त्रा संविदानास एनाः ॥ ( ऋ० १०।३०।१४ ) और जब जलों को वेदी में रख चुकता है तो नीचे के मंत्र पढ़ता है :— आगमन्नाप उशतीर्बर्हिरेदं न्यध्वरे असदन् देवयन्तीः । अध्वर्यवः सुनुतेन्द्राय सोममभूदुवः सुशका देवयज्या ॥ ( २ ) (ऋ० १०।३०।१५) २१—प्रातरनुवाक यज्ञ का शिर है। उपांशु और अंतर्याम प्राण और अपान है। ( उपांशु और अंतर्याम दो घड़े होते हैं जिनमें सोम रस रक्खा जाता है। घड़ों को उपांशु पात्र और अंतर्याम पात्र कहते हैं। और घड़ों के ऊपर जो छोटे प्याले से होते हैं उनको उपांशु ग्रह और अंतर्याम ग्रह कहते हैं )। वाणी वज्र है। जब उपांशु और अंतर्याम से आहुतियां दी जाती हों तो होता शब्द न बोले। यदि वह बोलेगा तो इस वाणी रूपी वज्र के द्वारा यजमान के प्राण ले लेगा। यदि बोल पड़े तो किसी अन्य को चाहिये कि होता से कहदे कि तुमने वाणी बोलकर वाणी रूपी वज्र से होता के प्राण ले लिये अब तुम्हारे प्राण भी चले जायँगे। सदा ऐसा ही होता है। इस लिये जब उपांशु और अंतर्याम से आहुतियां दी जायं तो होता वाणी को न निकाले। जब उपांशु से आहुति दी जा चुके तो वह यह बोले :— “प्राणं यच्छ स्वाहा त्वा सुह्व सूर्याय ।” अर्थात् “प्राण को ले । स्वाहा । हे अच्छी प्रकार बुलाने वाली वाणी, तुझको सूर्य के लिये छोड़ता हूँ ।” अब वह प्राण को खींचे और कहे, “हे प्राण, मुझ में प्राण धारण करा ।” जब अंतर्याम ग्रह से आहुति दी जा चुके तो वह बोले :— “अपानं यच्छ स्वाहा त्वा सुह्व सूर्याय ।”
तीसरा अध्याय ] १२९ और अपान को बाहर निकाल कर कहे, "हे अपान, मुझ में अपान धारण करा।" फिर जिस पत्थर पर उपांशु का सोम पीसा गया उसको यह कह कर छूता है "व्यानाय त्वा" और वाणी को छोड़ता है। यह उपांश सवन आत्मा है। होता इस प्रकार आत्मा में प्राण धारण करा के वाणी को छोड़ता है, और पूरी आयु को प्राप्त होता है। इसी प्रकार वह भी जो इस रहस्य को समझता है। (३) २२—यहाँ कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि होता उन सब के साथ चले या न चले। कुछ लोग कहते हैं कि चले, क्योंकि बहिष्पवमान का स्तोत्र मनुष्यों और देवों दोनों के लिए है। इस लिये यह भी उसमें शामिल हो सकता है। परन्तु यह विचार ठीक नहीं। यदि वह चलेगा तो ऋक् को साम के पीछे डाल देगा। यदि कोई उसे ऐसा करते भी देखे तो उससे कह दे—"यह होता साम गाने वालों के पीछे हो लिया और हमने अपना यश उद्गाता को दे दिया। अपने स्थान से गिर गया और गिरता रहेगा"। ऐसा सदा होता है। इस लिये जहाँ बैठा है वहीं बैठा रहे और यह अनुमंत्र पढ़ता रहे, "यो देवानामिहसोम पीथोयज्ञे बर्हिषिवेद्यां । तस्यापि भक्षयामसि" । अर्थात् "इस बर्हि यज्ञ में देवों के लिए सोम निकाला गया, उसे हम खावें।" इस प्रकार होता उस सोम से वंचित नहीं रहता। अब उसको कहना चाहिये:— "मुखमसि मुखं भूयासम्" "तू मुख है, मैं भी मुख अर्थात् मुख्य हो जाऊँ।" ९
१३० [ दूसरी पञ्चिका बहिष्पवमान यज्ञ का मुख (मुख्य भाग) है। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने लोगों में मुख्य होता है। श्रेष्ठ होता है। दीर्घजिह्वी (लम्बी ज़बान वाली) नाम की एक आसुरी स्त्री थी। उसने देवताओं के प्रातःसवन को चाट लिया। उसमें नशा नहीं रहा। देवों ने इसका उपचार करना चाहा। उन्होंने मित्र और वरुण से कहा, "तुम दोनों इसका उपचार कर दो"। उन्होंने कहा, "अच्छा, पहले हम तुमसे वर माँग लें।" देवों ने कहा, "माँग लो"। उन्होंने प्रातःसवन में से पयस्या (मट्ठे) को माँग लिया। यह उनका सदा का वर है। यह जो पहले उस आसुरी ने बिना नशे के कर दिया था वह पयस्या मट्ठे के द्वारा ठीक हो गया। क्योंकि (मित्र और वरुण) दोनों ने पयस्या के द्वारा (सोम रस को) ठीक कर दिया। (४) २३—देवों के सवन साथ जुड़े नहीं रहते थे (गिरे पड़ते थे) उन्होंने पुरोडाशों को देखा। उन्होंने उनमें से हर एक सवन का भाग अलग कर दिया। जिससे वह सब सवन जुड़े रहें। इस लिये जब सवनों के लिये पुरोडाश के भाग किये जाते हैं तो वे सवन जुड़े रहते हैं। इसी प्रकार उन्होंने उनको जोड़े रक्खा। देवों ने इनको (सोमरस से) पहले काटा। इस लिये इनका नाम पुरोडाश हुआ। यही पुरोडाशों का पुरोडाशत्व है। इस पर कुछ लोग कहते हैं कि हर एक सवन के लिये इस प्रकार पुरोडाश को विभाजित करे—प्रातः सवन के लिये आठ कपालों का, दोपहर के सवन के लिए ११ कपालों का और १२ कपालों का तीसरे सवन के लिए। क्योंकि सवनों का रूप छन्दों के रूपों के अनुसार है। लेकिन यह बात माननीय नहीं। जितने पुरोडाश सवनों के लिए काटे जाते हैं वे सब इन्द्र के हैं। इस लिये उनको ११ कपालों पर ही रखना चाहिये।
तीसरा अध्याय ] १३१ कुछ का कथन है कि पुरोडाश का जितना भाग बिना घी लगा हुआ हो उतना ही खाले, सोम पान की रक्षा के लिए। क्योंकि घृतरूपी वज्र से ही इन्द्र ने वृत्र को मारा। परन्तु यह माननीय नहीं। क्योंकि जो हवि है वह भी अग्नि में डाली जाती है और जो सोम-पान है वह भी अग्नि में छोड़ा जाता है। इस लिये पुरोडाश का जो भाग चाहे खाले। ये जो हवियां, आज्य, धान, करंभ, परिवाप, पुरोडाश, पयस्या आदि हैं वे यजमान के पास चारों ओर से आ जाते हैं, इसी प्रकार जो इस रहस्य को समझता है उसके पास यह चारों ओर से आ जाते हैं। (५) २४—जो हवियों के पंचक को समझता है वह इन पंचकों द्वारा समृद्धि को पाता है। यज्ञ की हवियों का पंचक यह है :— धान, करंभ, परिवाप, पुरोडाश, पयस्या। जो इस रहस्य को समझता है वह इन हवियों के पंचक द्वारा समृद्धि को पाता है। जो यज्ञ के अक्षरों के पंचक को समझता है वह अक्षरों के पंचक द्वारा यज्ञ से समृद्धि का लाभ करता है। यह अक्षर-पंचक यह है :—सु, मत्, पद्, वग्, दे। जो इस रहस्य को समझता है वह अक्षरों के पंचक द्वारा समृद्धि को लाभ करता है। जो यज्ञ के नराशंसपंचक को समझता है वह इसके द्वारा समृद्धि को पाता है। प्रातःसवन के दो नराशंस हैं। दोपहर के सवन के दो और तीसरे सवन का एक। यह नराशंस पंचक है। जो इस रहस्य को समझता है वह इसके द्वारा समृद्धि को लाभ करता है। जो यज्ञ के सवन पंचक को जानता है वह इसके द्वारा समृद्धि को प्राप्त करता है। यह सवन पंचक यह है :—सोम के पहले दिन का पशु-उपवसथ, तीन सवन, पशुरनुबंध्य। यह यज्ञ का सवन-पंचक है। जो इस रहस्य को समझता है वह सवन-पंचक द्वारा समृद्धि को लाभ करता है।
अध्याय समाप्त
१३२ [ दूसरी पञ्चिका हविष्पंचक का याज्य मंत्र यह है :— हरि वाँ इन्द्रो धाना प्रत्तु पूषण्वान् करंभं सरस्वतीवान् भारतीवान् परिवाप इन्द्रस्यापूप” । “घोड़ों वाला इन्द्र धान खावे, पूषावाला करंभ, सरस्वती- वाला और भारतीवाला इन्द्र परिवाप खावे । इन्द्र का पुरोडाश या अपूप है ।” इन्द्र के दो घोड़े हैं ऋक् और साम । पशु पूषन हैं । करंभ अन्न है । सरस्वतीवान् और भारतीवान् कहा, इसमें सरस्वती का अर्थ है वाणी । प्राण भरत है । “परिवाप इन्द्रस्य अपूप” में परिवाप अन्न है और अपूप इन्द्रिय है । इस प्रकार यज्ञ करके होता यजमान को देवताओं का सायुज्य, सरूपता और सालो- क्यता प्राप्त करा देता है और स्वयं भी श्रेय, सायुज्य और श्रेष्ठता का लाभ करता है जो इस रहस्य को समझता है । पुरोडाश की हर सवन की स्विष्टकृत आहुति यह है “हविरग्नेवीहि”—“अग्नि हवि खा !” इस प्रकार अवत्सार ऋषि अग्नि के प्रिय धाम को पा गया और परम लोक को पहुँच गया । जो इस रहस्य को समझता है और समझकर हवि-पंचक की आहुति देता है और याज्य मंत्र बोलता है वह भी यही लाभ प्राप्त करता है । (६) ऐतरेय ब्राह्मण की दूसरी पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त
चौथा अध्याय २५-सोम राजा का पहले पान करने के लिये देव झगड़ पड़े। उन्होंने चाहा कि "मैं पहले पिऊँ", "मैं पहले पिऊँ।" अब वे इस बात पर राजी हुये कि बाजी लगाकर दौड़ें। जो जीत जाय वही पहले पीले। ऐसा कह कर वह दौड़े। जितने दौड़े थे उनमें वायु पहले नियत स्थान पर पहुँचा, फिर इन्द्र, फिर मित्र और वरुण, फिर दोनों अश्विन। इन्द्र यह सोच कर कि मैं वायु से आगे पहुँचूँ, (ऐसा दौड़ा कि) वायु के पास ही गिर पड़ा। तब उसने कहा, "हम दोनों साथ आये हैं इसलिये दोनों जीते हैं"। उस (वायु) ने कहा, "नहीं मैं ही जीता हूँ"। इन्द्र ने कहा, "तीसरा भाग मुझे मिले, हम दोनों जीते हैं"। उस (वायु) ने कहा, "नहीं, मैं ही जीता हूँ।" तब इन्द्र ने कहा, "चौथाई मुझे मिले, हम दोनों जीते हैं"। वायु मान गया और चौथाई भाग इन्द्र को मिला। तभी से इन्द्र को चौथाई भाग मिलता है और वायु को तीन भाग। इस प्रकार इन्द्र और वायु दोनों जीते। फिर मित्र और वरुण। फिर दोनों अश्विन। वह जिस जिस क्रम से जीते उसी क्रम से ( १३३ )
१३४ [ दूसरी पञ्चिका उनको सोम पीने का अधिकार मिला, इन्द्र और वायु पहले, फिर मित्र और वरुण, फिर अश्विन। ऐन्द्र-वायव ग्रह (वह घड़ा जो इन्द्र-वायु का है) वह है जिसमें इन्द्र का चौथाई भाग है। इस बात को एक ऋषि ने देखा था। उसने यह मन्त्र पढ़ा:— "नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः" ❄ (ऋ० ४।४६।२) "वायु और उसका सारथि इन्द्र।" इस लिये आजकल जब भरत अर्थात् वीर पुरुष शत्रुओं को जीत कर युद्ध में लूट का माल लेते हैं, तब सारथि लोग कहते हैं, कि इसमें चौथाई भाग हमारा है क्योंकि इन्द्र ने वायु का सारथि बनकर विजय पाई थी। (१) २६—यह जो दो देवतों के सोमग्रह या घड़े हैं वे प्राण हैं। इन्द्र और वायु के वाणी और प्राण। मित्र और वरुण के चक्षु और मन। और अश्विन के श्रोत्र और आत्मा। कुछ लोग ऐन्द्रवायु वाले घड़े में से आहुति देते समय दो अनुष्टुभ् छन्दों में पुरोनुवाक्य और दो गायत्री छन्दों में याज्य पढ़ते हैं। चूँकि ऐन्द्रवायव्य ग्रह वाणी और प्राण का है इस लिये ठीक- ठीक छन्द हो गये (अर्थात् अनुष्टुभ् वाणी का और गायत्री प्राण का)। परन्तु यह बात माननीय नहीं। क्योंकि जब पुरोनुवाक्य मंत्र याज्य मंत्र से बढ़ गया तो यज्ञ सफल नहीं होता। जब याज्य पुरोनुवाक्य से बढ़ जाता है तब सफलता होती है। इसी प्रकार जब दोनों बराबर हों (तब भी सफलता नहीं होती)। प्राण और वाणी की सफलता के लिये ऐसा (कि दो अनुष्टुभ् छन्दों में अनुवाक्य पढ़े और दो गायत्री ❄ पूरामंत्र शेतना नो० (ऋ० ४।४६।२) २६ वें खंड में देखो।
चौथा अध्याय ] १३५ छन्दों में याज्य )। इससे कामना पूरी होगी। पहला पुरोनु- वाक्य वायु का है :- वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः । तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥ ( ऋ० १।२।१ ) दूसरा इन्द्र और वायु का :- इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरागतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ ( ऋ० १।२।४ ) इसी प्रकार दो याज्यों में जो पहला याज्य मंत्र वायु का है अर्थात् :- अग्रं पिवा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु । त्वं हि पूर्वपा असि ॥ ( ऋ० ४।४६।१ ) उससे यजमान में प्राण धारण कराता है। क्योंकि वायु प्राण है। और जो इन्द्र वायु का याज्य है अर्थात् :- शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्र सारथिः । वायो सुतस्य तृम्पतम् ॥ ( ऋ० ४।४६।२ ) इसमें जो इन्द्र का पद है उससे वाणी को धारण कराता है। क्योंकि वाणी इन्द्र की है। इस प्रकार प्राण और वाणी की जो जो कामना है उसको बिना यज्ञ को विषम किये हुये पूरी कर देता है। (२) २७-दो देवतों का जो सोम है वह प्राण है। उसे एक ही पात्र से ग्रहण करते हैं। क्योंकि सब प्राण एक ही हैं। दो पात्रों से आहुति देते हैं क्योंकि प्राण दो हैं। इसके पश्चात् जिस यजु मंत्र से अध्वर्यु सोम के प्याले को देता है, उसी मन्त्र से होता ग्रहण करता है :- “एष वसुः पुरूवसुरहिवसुः पुरूवसुर्मयि वसुः पुरूवसुर्वाक्पा वाचं मे पाहि”
१३६ [ दूसरी पञ्चिका "यह अच्छा है। यह बहुत अच्छा है। यहाँ अच्छा है, बहुत अच्छा है। मुझमें अच्छा है, बहुत अच्छा है। हे वाणी के रक्षक, मेरी वाणी की रक्षा कर।" होता सोम को ऐन्द्रवायवी ग्रह से पीता है। अब पढ़ता है :— "उपहूता वाक् सह प्राणेनोरमां वाक सह प्राणेन ह्वयतामुपहूता ऋषयो दैव्यास्तनू पावानेस्तन्वस्तपोजा उपमामृषयो दैव्यासो ह्वयं तां तनूपावानस्तन्वस्तपोजा" । "वाणी प्राण के साथ बुलाई गई। वाणी प्राण के साथ मुझे बुलावे, दिव्य ऋषि जो शरीरों की रक्षा करने वाले और तप से उत्पन्न हुये हैं, बुलाये गये। दिव्य ऋषि जो शरीर के रक्षक और तप से उत्पन्न हुये हैं मुझे बुलावें।" दिव्य शरीरों के रक्षक और तप से उत्पन्न हुये ऋषियों का अर्थ है प्राण। उन्हीं को वह बुलाता है। मित्र और वरुण के ग्रह से इस मन्त्र को पढ़ कर पीता है— "एष वसुविद्वद् वसुरिह वसुविद्वद् वसुर्मयि वसुविद्वद् वसुश्चक्षुष्पा- श्चक्षुर्मे पाहि" । "यह वसु है, ज्ञान वाला वसु है। यहाँ वसु है, ज्ञान वाला वसु है। मुझमें वसु है, ज्ञान वाला वसु है। हे आँख के रक्षक, मेरी आँख की रक्षा कर।" अब वह कहता है:— "उपहूतं चक्षुः सहमनसोपमां चक्षुः सहमनसाह्वयतामुपहूता ऋषयो दैव्यास्तनूपावानस्तन्वस्तपोजा उपमामृषयो दैव्यासो ह्वयतां तनूपावान- स्तन्वस्तपोजा" । "मन के साथ आँख बुलाई गई। आँख मुझे मन के साथ बुलावे। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि बुलाये गये। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि मुझे बुलावें"।
चौथा अध्याय ] १३७ दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि प्राण हैं। इससे उन्हीं को बुलाता है। नीचे के मंत्र से अश्वि के ग्रहों से पान करता है :— “एष वसुः संयद् वसुरिहवसुः संयद् वसुर्मयि वसुः संयद् वसुः श्रोत्रपाः श्रोत्रं मे पाहि”। “यह वसु है, सदा रहने वाला वसु है। यहाँ वसु है, सदा रहने वाला वसु है। हे कान के रक्षक, मेरे कान की रक्षा कर”। अब वह कहता है:— उपहूतं श्रोत्रं सहात्मनोपमां श्रोत्रं सहात्मनाह्वयतामुपहूता ऋषयो दैव्यास्तनूपावानस्तन्वस्तपोजां उपमामृषयो दैव्यासोह्वयंतां तनूपावानस्तन्व- स्तपोजा”। “कान आत्मा के साथ बुलाया गया। कान आत्मा के साथ मुझे बुलावे। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि बुलाये गये। दिव्यतनूपा और तपोजा ऋषि मुझे बुलायें”। यह दिव्य तनूपा, तपोजा ऋषि प्राण हैं, इससे इन्हीं को बुलाता है। ऐन्द्रवायव्य ग्रह से पीते समय होता ग्रह (घड़े या प्याले) के मुँह को अपनी ओर करके उसमें से पीता है। क्योंकि प्राण और अपान उसके सामने है। इसी प्रकार मित्र-वरुण के ग्रह में से पीता है क्योंकि दोनों आँखें उसके सामने हैं, अश्विनों के ग्रह से पीते समय अपने मुख को पीछे फेर लेता है क्योंकि मनुष्य और पशु चारों ओर से शब्द सुनते हैं। (३) २८—दो देवताओं के सोम पात्र प्राण हैं। इसलिये प्राणों को जारी रखने और उनको टूटने न देने के लिये याज्य मन्त्रों को निरन्तर पढ़ना चाहिये। दो देवताओं के सोम पात्र प्राण हैं। अतएव होता अनुवषट्कार न पढ़े। इससे प्राणों का क्रम टूट जायगा। क्योंकि अनुवषट्कार क्रम के टूटने का द्योतक है। यदि
१३८ [ दूसरी पञ्चिका कोई होता को अनुवषट्कार करते देखे तो कहे कि तुमने प्राणों का क्रम बन्द कर दिया जो अन्यथा बन्द न होता और इसलिये तुम्हारा जीवन समाप्त हो जायगा। ऐसा सदा होता है। इसलिये दो देवताओं के सोमपात्रों पर अनुवषट्कार न पढ़े। इस पर कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि जब मित्र, वरुण सम्बन्धी पुरोहित दो बार आगू कहता है और दो बार याज्य मन्त्र पढ़ने की प्रेरणा करता है तो होता एक बार आगू कह कर दो बार वषट्कार क्यों बोलता है (आगू का अर्थ यह है कि पुरोहित कहता है "होता यक्षत" या "होतर्यज", यह वह दो बार कहता है। होता एक बार उत्तर देता है "ये ३ यजा- महे।" (प्रश्न यह है कि दो प्रश्नों का होता एक ही उत्तर क्यों देता है?) इसका उत्तर यह है कि दो देवताओं के सोम पात्र तो प्राण हैं और आगू वज्र है। इसलिये यदि होता दो याज्य मन्त्रों के बीच में आगू बोल दे तो वह वज्र से यजमान का जीवन काट दे। (यदि कोई होता को ऐसा करते देखे तो) कहे कि तूने यजमान के जीवन को आगू वज्र से काट कर अपना जीवन भी काट डाला। सदा ऐसा ही होता है। होता दो याज्य मन्त्रों के बीच में आगू न बोले। इसके अतिरिक्त मैत्रावरुण पुरोहित यज्ञ का मन है और होता वाणी है। मन से प्रेरित होकर ही वाणी बोलती है। जो मन से विरुद्ध वाणी बोलता है वह वाणी असुरों को प्यारी होती है, देवों को नहीं। होता का आगू मैत्रावरुण के पुरोहित के दोनों आगूओं के अन्तर्गत है। (४) २९—ऋतु याज प्राण हैं। जो ऋतु याज करते हैं अर्थात् जो ऋतुओं के लिये आहुतियाँ देते हैं वे यजमान को प्राण धारण कराते हैं। 'ऋतुना' शब्द से आरम्भ होते हुये ऋतुओं के छः मन्त्र बोल कर यजमान में प्राण धारण कराते हैं।
चौथा अध्याय ] १३९ “ऋतुभिः” शब्द से आरम्भ होते हुये चार मन्त्रों से अपान को यजमान में धारण कराते हैं। पीछे के दो मन्त्र जो 'ऋतुना' से आरम्भ होते हैं उनसे यजमान में व्यान धारण कराते हैं। यह प्राण तीन तरह का है—प्राण, अपान, व्यान। यह जो "ऋतुना", "ऋतुभिः", "ऋतुना" आदि वाले मन्त्रों को निरन्तर पढ़ते हैं वह प्राणों के सिलसिले को जारी रखने के लिये। उनका खंडन न होने देने के लिये। ऋतुयाज प्राण हैं। उनके पीछे अनुवषट्- कार न कहे। ऋतुओं का कोई अन्त नहीं। एक के बाद दूसरी आती है। अगर वह ऋतुयाजों के पीछे अनुवषट्कार कहेगा तो रोक देगा। क्योंकि अनुवषट्कार विराम का सूचक है। जो इसको कहेगा वह ऋतुओं को रोक देगा और आपत्ति में पड़ेगा। सदा ऐसा ही होता है। इसलिये ऋतुयाज के मन्त्र बोलने के बाद अनुवषट्कार न कहे। (५) ३०—दो देवों वाले सोम पात्र प्राण हैं। और इला अर्थात् पुरोडाश पशु हैं। सोम पात्रों में से पीकर इला को बुलाता है। पशु ही भोजन है। इस प्रकार पशुओं को बुलाता है यजमान में पशुओं को धारण कराता है। यहाँ प्रश्न उठता है कि पहले इला ( पुरोडाश ) को खावे या चमसे में से पान करे। इसका उत्तर यह है कि पहले भोजन कर ले, फिर सोम पान करे। दो देवतों के सोम ग्रह से उसने सोम पान पहले कर ही लिया। इसलिये अब पहले अपने हाथ का पुरोडाश खाले, फिर चमसे में से सोम पान करे। इस तरह से उसे दोनों तरह का अन्न अर्थात् खाना और पानी मिल जाता है। ( ग्रह और चमसा ) दोनों में से सोम पान करने से सब प्रकार का भोजन प्राप्त हो जाता है। दो देवतों के ग्रह प्राण हैं और होता का चमसा आत्मा है।