भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

तीसरा अध्याय ] १२५ गया । वे उसको मिलने गये। सरस्वती ने उसे चारों ओर से घेर लिया। इसलिये इस स्थान को परिसारक कहते हैं। क्योंकि सरस्वती ने इसको घेर लिया (परि ससार) इसलिये ऋषि कहने लगे कि देवता इसको जानते हैं, लाओ इसे बुला लें । उनको बुलाने के पश्चात् उन्होंने "अपो नप्त्रीयम्" बनाया । अर्थात् "प्र देवत्रा ब्रह्मणे गातुरेतु" इत्यादि । इसके द्वारा उन्होंने जलों के परम धाम को पाया और देवों के परम धाम को भी । जो कोई इस रहस्य को समझता है और जो इस रहस्य को समझ कर 'अपोनप्त्रीय' को करता है वह जलों और देवों के प्रिय धाम को प्राप्त होता है और परम लोक पर विजय पाता है। उसको इसका पाठ निरन्तर करना चाहिये । ऐसा करने से सन्तान के लिये निरन्तर वर्षा होगी । यदि ठहर ठहर कर पढ़ेगा तो सन्तान के लिये बादल भी रुक कर बरसेगा । इसलिए निरन्तर पढ़ना चाहिये । यदि पहली ऋचा को बिना रुके हुये तीन बार बोले तो सभी सूक्त निरन्तर बोला हुआ माना जा सकता है। (१) २०—पहली नौ ऋचायें (१०।३० की) क्रमशः बोलकर ग्यारहवीं ऋचा को दसवीं के स्थान में अर्थात् "हिनोतानोऽअध्वरं देव यज्य" और दसवीं को ग्यारहवीं के स्थान में अर्थात् "आव- वृततीरधु नु द्विधारा" इत्यादि बोले। यह उस समय बोलना चाहिये जब "एकधना" नामक जलों को नदी से लावें । जब होता इन जलों को आता देखे तो कहे :— प्रति यदापो अदृशमायती घृ॒तं पयांसि बिभ्रतीर्मधूनि । अध्वर्यु- भिर्मनसा संविदाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तीः ॥ (ऋ० १०।३०।१३) जब जल आ जावें तो नीचे का मंत्र पढ़े :— आ धेनवः पयसा तूर्यर्था अमर्धन्तीरुप नो यन्तु मध्वा । महो राये बृहतीः सप्तविप्रो मयोभुवो जरिता जोहवीति ॥ (ऋ० ५।४३।१)