ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६ [ दूसरी पञ्चिका जब (वसतीवरि और एकधना जल) मिलाये जायं तो होता यह मंत्र पढ़े :- समन्या यन्त्युप यन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यः पृणन्ति। तन् शूचिं शुचयो दीदिवांसमपां नपातं परि तस्थुरापः ॥ (ऋ० २।३५।३) जो जल पहले दिन लाये जाते हैं उनको "वसतीवरि" और जो उसी दिन प्रातःकाल लाये जाते हैं उनको "एकधन" कहते हैं। ये दोनों जल इस बात पर झगड़ पड़े कि "हम यज्ञ को पहले ले जावें", "हम यज्ञ को पहले ले जावें।" भृगु ने इनको देखा कि झगड़ रहे हैं। उसने इनको ऊपर की ऋचा (ऋ० २।३५।३) से शान्त किया। इससे वह शान्त हो गये। जो इस रहस्य को समझ कर इस प्रकार जलों को शान्त करता है वह इसी प्रकार यज्ञ को पहले ले जायेगा। होता के चमसे में 'वसतीवरी और एकधना जलों के डालने पर यह मन्त्र पढ़ता है :- आपो न देवीरुप यन्ति होत्रियमवः पश्यन्ति विततं यथा रजः । प्राचैर्देवासः प्रणयन्ति देवयुं ब्रह्मप्रियं जोषयन्ते वरा इव । (ऋ० १०।८३।२) अब होता अध्वर्यु से पूछता है, "क्या तुमको जल मिल गये ?" जल ही यज्ञ है। इस प्रश्न से तात्पर्य यह है कि "क्या यज्ञ मिल गया ?" इस पर अध्वर्यु उत्तर देता है, "मिल गये। देख लो।" (अब होता अध्वर्यु से कहता है :-) "हे अध्वर्यु इन जलों से तुम इन्द्र के लिये मधु-सहित सोम को जो वर्षा लाने वाला और तीव्रान्त अर्थात् शुभ परिणाम वाला है। बीच में अन्य कृत्य करके निचोड़ो। वह इन्द्र कैसा है ? वसु वाला, रुद्र वाला, आदित्य वाला, ऋभु वाला, विभु वाला, अन्न वाला, बृहस्पति वाला, और विश्व-देव वाला, यह (आठ