ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] १२७ इन्द्र के विशेषण हैं )। जिस ( सोम ) को पीकर इन्द्र ने वृत्रों को मारा और शत्रुओं को पराजित किया । ओ३म् ।” यह कह कर होता अपनी जगह से उठता है । उठकर जलों का सम्मान करता है जैसे जब कोई प्रतिष्ठित पुरुष निकट आता है तो उठ कर सम्मान करते हैं । इसलिये उठ कर और सामने मुँह करके जलों का सम्मान किया जाता है । इसी प्रकार प्रतिष्ठित पुरुष का सम्मान करते हैं । इसलिये होता को सम्मानार्थ जलों के पीछे जाना चाहिये । यदि दूसरा कोई भी यज्ञ करे तो भी होता यश प्राप्ति के समर्थ है । इसलिये मंत्र पढ़ने वाले को जलों के पीछे जाना चाहिये । उनके पीछे जाते हुये उसे यह मंत्र बोलना चाहिये :- अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम् । पृञ्चतीर्मधुना पयः ॥ ( ऋ० १।२३।१६ ) जो यश की कामना करे वह यह मंत्र पढ़े । जो तेज या ब्रह्मवर्चस् की कामना करे वह यह मंत्र पढ़े :- अमूर्या उपसूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह । ता नो हिन्वन्त्वध्वरम् ॥ ( ऋ० १।२३।१७ ) जो पशु की कामना हो तो यह मंत्र पढ़े :- अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः । सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः ॥ ( ऋ० १।२३।१८ ) जो इनको पढ़ता हुआ जलों के पीछे जायगा वह अवश्य ही इन कामनाओं की पूर्ति करेगा । जो इस रहस्य को समझता है वह इसे इन कामनाओं को पा लेता है । जब वसतीवरी और एकधना जल वेदी पर रखे जा रहे हैं तब वह यह मंत्र पढ़ता है :-