ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] १२९ और अपान को बाहर निकाल कर कहे, "हे अपान, मुझ में अपान धारण करा।" फिर जिस पत्थर पर उपांशु का सोम पीसा गया उसको यह कह कर छूता है "व्यानाय त्वा" और वाणी को छोड़ता है। यह उपांश सवन आत्मा है। होता इस प्रकार आत्मा में प्राण धारण करा के वाणी को छोड़ता है, और पूरी आयु को प्राप्त होता है। इसी प्रकार वह भी जो इस रहस्य को समझता है। (३) २२—यहाँ कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि होता उन सब के साथ चले या न चले। कुछ लोग कहते हैं कि चले, क्योंकि बहिष्पवमान का स्तोत्र मनुष्यों और देवों दोनों के लिए है। इस लिये यह भी उसमें शामिल हो सकता है। परन्तु यह विचार ठीक नहीं। यदि वह चलेगा तो ऋक् को साम के पीछे डाल देगा। यदि कोई उसे ऐसा करते भी देखे तो उससे कह दे—"यह होता साम गाने वालों के पीछे हो लिया और हमने अपना यश उद्गाता को दे दिया। अपने स्थान से गिर गया और गिरता रहेगा"। ऐसा सदा होता है। इस लिये जहाँ बैठा है वहीं बैठा रहे और यह अनुमंत्र पढ़ता रहे, "यो देवानामिहसोम पीथोयज्ञे बर्हिषिवेद्यां । तस्यापि भक्षयामसि" । अर्थात् "इस बर्हि यज्ञ में देवों के लिए सोम निकाला गया, उसे हम खावें।" इस प्रकार होता उस सोम से वंचित नहीं रहता। अब उसको कहना चाहिये:— "मुखमसि मुखं भूयासम्" "तू मुख है, मैं भी मुख अर्थात् मुख्य हो जाऊँ।" ९