ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३० [ दूसरी पञ्चिका बहिष्पवमान यज्ञ का मुख (मुख्य भाग) है। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने लोगों में मुख्य होता है। श्रेष्ठ होता है। दीर्घजिह्वी (लम्बी ज़बान वाली) नाम की एक आसुरी स्त्री थी। उसने देवताओं के प्रातःसवन को चाट लिया। उसमें नशा नहीं रहा। देवों ने इसका उपचार करना चाहा। उन्होंने मित्र और वरुण से कहा, "तुम दोनों इसका उपचार कर दो"। उन्होंने कहा, "अच्छा, पहले हम तुमसे वर माँग लें।" देवों ने कहा, "माँग लो"। उन्होंने प्रातःसवन में से पयस्या (मट्ठे) को माँग लिया। यह उनका सदा का वर है। यह जो पहले उस आसुरी ने बिना नशे के कर दिया था वह पयस्या मट्ठे के द्वारा ठीक हो गया। क्योंकि (मित्र और वरुण) दोनों ने पयस्या के द्वारा (सोम रस को) ठीक कर दिया। (४) २३—देवों के सवन साथ जुड़े नहीं रहते थे (गिरे पड़ते थे) उन्होंने पुरोडाशों को देखा। उन्होंने उनमें से हर एक सवन का भाग अलग कर दिया। जिससे वह सब सवन जुड़े रहें। इस लिये जब सवनों के लिये पुरोडाश के भाग किये जाते हैं तो वे सवन जुड़े रहते हैं। इसी प्रकार उन्होंने उनको जोड़े रक्खा। देवों ने इनको (सोमरस से) पहले काटा। इस लिये इनका नाम पुरोडाश हुआ। यही पुरोडाशों का पुरोडाशत्व है। इस पर कुछ लोग कहते हैं कि हर एक सवन के लिये इस प्रकार पुरोडाश को विभाजित करे—प्रातः सवन के लिये आठ कपालों का, दोपहर के सवन के लिए ११ कपालों का और १२ कपालों का तीसरे सवन के लिए। क्योंकि सवनों का रूप छन्दों के रूपों के अनुसार है। लेकिन यह बात माननीय नहीं। जितने पुरोडाश सवनों के लिए काटे जाते हैं वे सब इन्द्र के हैं। इस लिये उनको ११ कपालों पर ही रखना चाहिये।