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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

अध्याय ३

अध्याय ३ १३—इक्ष्वाकु वंश के वेधस राजा का पुत्र राजा हरिश्चन्द्र निस्सन्तान था। उसकी सौ पत्नियां थीं। परन्तु उसके कोई पुत्र न हुआ। उसके घर में पर्वत और नारद दो ऋषि रहते थे। उसने नारद से पूछा :— “सभी पुत्र की इच्छा करते हैं, ज्ञानी हों या अज्ञानी। हे नारद, बताओ पुत्र से क्या लाभ होता है?” नारद ने इस एक श्लोक का दस श्लोकों में उत्तर दिया :— (१) अगर पिता जीते हुये, पुत्र का मुख देख ले तो उस का ऋण छूट जाता है और वह अमर हो जाता है। (२) प्राणियों के लिये जितने पृथिवी में भोग हैं, जितने अग्नि में और जितने जलों में, उनसे भी अधिक पिता के लिये पुत्र में। ( ४२८ )

ब्राह्मणो ! पुत्र की इच्छा करो ।

तीसरा अध्याय ४२९ ( ३ ) सदा पिता लोग पुत्र के द्वारा आपत्तियों को पार करते हैं । आत्मा आत्मा से उत्पन्न होता है । पुत्र एक अच्छी तारने वाली नौका है । ( ४ ) लोग ऐसा कहते हैं कि मल-युक्त रहने, बकरी का चमड़ा पहनने या दाढ़ी मूँछ रखने या तप करने से क्या लाभ ? ( अर्थात् अविवाहित रहने से कुछ लाभ नहीं )। हे ब्राह्मणो ! पुत्र की इच्छा करो । ( ५ ) अन्न प्राण देता है, कपड़ा रक्षा करता है, स्वर्ण रूप देता है । विवाह से पशु मिलते हैं, स्त्री सखा है । दुहिता कृपा का पात्र है । परन्तु पुत्र उस लोक में भी ज्योति है । ( ६ ) पति स्त्री में गर्भ के रूप में प्रविष्ट होता है । उसमें फिर नया जन्म लेकर दसवें मास में उत्पन्न होता है । ( ७ ) स्त्री तभी "जाया" होती है जब पुरुष उसमें पुत्र होकर जनमाता है । जो बीज उसमें रक्खा जाता है वह वृद्धि पाकर उपजता है । ( ८ ) देवों और ऋषियों ने पहले उसे तेज-युक्त कर दिया, फिर देवों ने मनुष्यों से कहा कि यह अब तुम्हारी जननी है अर्थात् तुम इसके द्वारा उत्पन्न हो । ( ९ ) जिसके पुत्र नहीं उसका लोक नहीं । इसको सब पशु जानते हैं । इसलिये वहाँ मा और बहिन के साथ भी पुत्र समागम करता है । (१०) जिनके पुत्र होते हैं वे शोक रहित होकर बड़े चौड़े चकले मार्ग पर चलते हैं । पशु और पक्षी भी इस बात को जानते हैं और वे अपनी माता तक से समागम करते हैं । (१)

४३० [ सातवीं पञ्चिका १४--फिर नारद ने उससे कहा, "राजा 'वरुण के पास जाओ और कहो कि मुझे पुत्र दो। मैं उस पुत्र से तुम्हारा यज्ञ करूँगा"। उसने कहा, 'अच्छा'। वह राजा वरुण के पास गया और कहने लगा, "मुझे पुत्र मिल जाय तो मैं तेरा यज्ञ करूँ"। उसने कहा, "अच्छा"। उसके रोहित नाम का पुत्र हुआ। वरुण ने कहा, "तेरे पुत्र हो गया, तू उससे मेरा यज्ञ कर"। उसने कहा, "जब पशु दस दिन का हो जाय तो तेरा यज्ञ करूँ"। उसने कहा, 'अच्छा'। जब वह दस दिन का हो गया तब वरुण ने उससे कहा, "अब तो यह दस दिन का हो गया। अब तू इससे मेरा यज्ञ कर"। हरिश्चन्द्र ने कहा, "जब पशु के दाँत हो जाते हैं तब वह यज्ञ के योग्य होता है। इसके दाँत निकल आने दे, तब मैं इससे तेरा यज्ञ करूँगा'। उसने कहा, "अच्छा"। उसके दाँत निकल आये। तब वरुण ने कहा, "अब इसके दाँत निकल आये। यज्ञ कर"। हरिश्चन्द्र ने कहा, "जब पशु के दाँत गिर पड़ते हैं तब वह यज्ञ के योग्य होता है। इसके दाँत गिर जाने दे तब मैं तेरा यज्ञ करूँगा"। उसने कहा, "अच्छा"। अब उसके दाँत गिर गये। तब वरुण ने कहा, "इसके दाँत तो गिर गये। अब यज्ञ कर"। हरिश्चन्द्र ने कहा, "जब पशु के दाँत दुबारा जमते हैं तब वह यज्ञ के योग्य होता है। इसके दाँत फिर जम आने दे, तब तेरा यज्ञ करूँगा"। उसने कहा, "अच्छा"। अब उसके दाँत फिर जम आये। वरुण ने कहा, "इसके दाँत तो फिर जम आये। तू मेरा यज्ञ कर"। हरिश्चन्द्र ने कहा, "जब क्षत्रिय शस्त्रधारी हो जाता है तब यज्ञ के योग्य होता है। इसको शस्त्रधारी हो जाने दे, तब इससे तेरा यज्ञ करूँगा"। उसने कहा, "अच्छा"। अब वह शस्त्रधारी हो गया। तब वरुण ने कहा, "अब यह शस्त्रधारी

तीसरा अध्याय ] ४३१ भी हो गया । अब तू इससे मेरा यज्ञ कर" । उसने कहा, "अच्छा", और पुत्र को बुलाया । और उससे कहा, "जिसने तुझको मुझे दिया उसके लिये मैं तुझे यज्ञ में दूंगा" । उसने इनकार किया और धनुष लेकर चला गया और साल भर तक जंगल में फिरता रहा । (२) १५-अब वरुण ने इक्ष्वाकु की संतान अर्थात् हरिश्चन्द्र को पकड़ लिया । और उसका पेट फूल गया । इस बात को रोहित ने सुना और जंगल से गांव में आया । वहाँ इन्द्र पुरुष के रूप में मिला और उससे बोला, "हे रोहित, हमने सुना है कि जो यात्रा नहीं करता उसको श्री नहीं मिलती । मनुष्यों में रहते-रहते अच्छा आदमी भी बुरा हो जाता है । इन्द्र उसीका सखा है जो विचरता रहता है । इसलिये तू विचरता ही रह" । रोहित ने सोचा कि ब्राह्मण ने मुझसे विचरने को कहा है । इसलिए वह दूसरे वर्ष बन में विचरता रहा । जब बन से आकर वह एक गाँव में घुसा, इन्द्र ने पुरुष के रूप में उससे मिलकर कहा, "जो विचरता है उसके पैर फूलयुक्त होते हैं । उसका आत्मा फल को उगाता और काटता है और भ्रमण के श्रम से उसके सब पाप छूट जाते हैं । इसलिये तू विचरता ही रह" । रोहित ने सोचा कि ब्राह्मण ने मुझे विचरने के लिये कहा है, इस लिये वह तीसरे साल भी वन में विचरता रहा । जब वह बन से आकर गाँव में घुसने लगा तो इन्द्र ने पुरुष के रूप में मिलकर उससे कहा, "बैठे हुये का भाग्य बैठता है, खड़े हुये का खड़ा होता है । जो पड़ा रहता है उसका भाग्य भी पड़ा रहता है । जो विचरता' है उसका भाग्य भी विचरता है । इसलिये तू विचरता रह" ।

४३२ [सातवीं पञ्चिका रोहित ने सोचा कि एक ब्राह्मण ने मुझसे विचरने के लिये कहा है इसलिये वह चौथे साल भी वन में विचरता रहा । जब वह वन से आकर गाँव में घुसने लगा तो इन्द्र ने पुरुष के रूप में उससे कहा, "कलि जमीन पर पड़ा रहता है, द्वापर ऊपर मंडलाता है । त्रेता खड़ा रहता है और सत् युग चलता रहता है । इस लिये विचरता रह" । रोहित ने सोचा कि ब्राह्मण ने मुझसे विचरने के लिये कहा है इस लिये वह पाँचवें वर्ष भी वन में फिरता रहा । जब वह जंगल से आकर गाँव में घुसने लगा तो इन्द्र ने पुरुष के रूप में उससे कहा, "जो विचरता है उसको मधु और उदुम्बर का मीठा फल मिलता है । सूर्य के सौन्दर्य को देख कि विचरता हुआ ऊवता नहीं । इसलिये विचरता रह" । रोहित ने सोचा कि एक ब्राह्मण ने मुझे विचरने के लिये कहा है। इसलिये वह छठे साल विचरता रहा । वह जंगल में सुयवस ऋषि के पुत्र अजीगर्त से, जो बिना भोजन के रह रहा था, मिला । उसके तीन लड़के थे शुनः पुच्छ, शुनः शेप और शुनोलांगूल । उसने उससे कहा, 'ऋषि, मैं तुमको सौ गायें दूंगा, तुम मुझे इन पुत्रों में से एक दे दो कि मैं यज्ञ में इसके द्वारा अपने को बचा सकूँ' । अजीगर्त ने ज्येष्ठ पुत्र को लेकर कहा "इसे मत लो", माता ने कनिष्ठ के लिये यही कहा । वे दोनों बीच के शुनः शेप के लिये राजी हो गये । वह सौ गायें देकर उसको लेकर वन से ग्राम में आया । और पिता से बोला, "मैं इसके द्वारा अपने को यज्ञ की बलि से बचाऊँगा," वह वरुण के पास आकर बोला, 'मैं इसके द्वारा तेरा यज्ञ करूँगा ।" वरुण ने कहा, "अच्छा, क्योंकि क्षत्रिय से ब्राह्मण और अच्छा ।" तब वरुण ने उसको राजसूय यज्ञ की विधि

तीसरा अध्याय ] ४३३ बताई। इसी प्रकार अभिषेचन के दिन उसने पशु के बदले पुरुष को बलि किया। (३) १६-इस यज्ञ में विश्वामित्र होता था, जमदग्नि अध्वर्यु, वसिष्ठ ब्रह्मा, अयास्य उद्गाता। आरम्भ करने पर कोई ऐसा आदमी न मिला जो उसको बाँधता। सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, "मुझे सौ गायें और दो। मैं उसको बाँधूँगा"। उसको सौ गायें और दीं। और उसने बाँध दिया। आप्री मन्त्रों का पाठ हो गया और अग्नि की परिक्रमा भी हो गई। अब उसको बध करने वाला कोई न मिला। तब सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, "मुझे सौ गायें और दो। मैं उसका बध कर दूँगा"। उसको सौ गायें और दी गईं और वह बध करने के लिये तलवार तेज करने लगा। शुनःशेप ने देखा कि यह मुझे ऐसे मार रहे हैं मानों मैं आदमी ही नहीं हूँ। मैं अब देवताओं के पास दौड़ूँ। वह देवताओं में सबसे पहले प्रजापति के पास गया। और यह ऋचा पढ़ी :- कस्य नूनं कतमस्यामृतानाम्......(ऋ० १।२४।१) इस प्रकार पूजा करते हुये उसको प्रजापति ने कहा, "अग्नि देवों में सब से निकट है। तू उसके पास जा"। अब वह इस मंत्र से अग्नि के पास गया:- अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानाम्......(ऋ० १।२४।२) इस प्रकार पूजा करते हुये उससे अग्नि ने कहा, "प्राणियों का स्वामी सविता है उसके पास जाओ।" अब नीचे के तीन मन्त्रों से सविता के पास गया:- अभित्वा देव सवितः......(३) यश्चिद्धित इत्या......(४) भगभक्तस्य ते......(५) (ऋ० १।२४।३-५) २८

४३४ [ सातवीं पञ्चिका सविता ने कहा, “तू राजा वरुण के लिये बाँधा गया है। उसी के पास जा”। उसने इन ३१ मन्त्रों (ऋ० १।२४।६-१५; १।२५।१-२१) से वरुण से प्रार्थना की। वरुण ने उससे कहा, “देवों में अग्नि मुख है। और सबसे अधिक सहृदय है। उसी की स्तुति कर। तो हम तुझको छोड़ देंगे”। तब उसने अग्नि की २२ मन्त्रों से स्तुति की (ऋ०१।२६।१-१० तथा १।२७।१-१२)। अग्नि ने कहा, “विश्वेदेवों की स्तुति कर। तब हम तुझे छोड़ेंगे”। उसने विश्वेदेवों की नीचे के मंत्र से स्तुति की:— नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यः...(ऋ० १।२७।१३) विश्वेदेवों ने उससे कहा “देवों में इन्द्र सबसे अधिक ओज वाला, बल वाला, सहन वाला और पार लगाने वाला है। उसकी स्तुति कर तब हम तुझे छोड़ेंगे”। उसने इन मंत्रों से इन्द्र की स्तुति की :— यच्चिद्धि सत्य सोमपा......आदि (ऋग्वेद के पहले मंडल का २९वाँ सूक्त और ३०वें सूक्त के पहले १५ मंत्र ) इन्द्र ने प्रसन्न होकर उसको एक सोने का रथ दिया। उसने नीचे के मंत्र से इसे स्वीकार किया:— शश्वदिन्द्रः.........(ऋ० १।३०।१६) तब इन्द्र ने उससे कहा “अश्विनों की स्तुति कर। तब हम तुझे छोड़ेंगे”। उसने अगले तीन मंत्रों से अश्विनों की स्तुति की।

.तीसरा अध्याय ] ४३५ आश्विना वश्वा......(१७) समानयाजनो हि वां......(१८) न्यध्र्यस्य मूर्धनि......(१६) (ऋ० १।३०।१७-१९ । अश्विनों ने उससे कहा, "तू उषा की स्तुति कर। तब हम छोड़े गे"। उसने अगले तीन मंत्रों से उषा की स्तुति की। कस्त उषः कधप्रिये......(२०) वयं हिते अमन्मह्या......(२१) त्वं त्येभिरा गहि......(२२) (ऋ० १।३०।२०-२२) उसके एकाएक मंत्र पढ़ने पर उसके बंधन खुलते गये और ऐक्ष्वाक का पेट पटकता गया। जब वह अन्तिम मंत्र पढ़ चुका तो अन्तिम बंधन टूट गया और हरिश्चन्द्र स्वस्थ हो गया ।(४) १७—अब ऋत्विजों ने शुनःशेप से कहा, "अब तू हममें से ही है। आज के यज्ञ में भाग ले"। अब शुनःशेप ने “अंजः सव” अर्थात् सोमरस निकालने की विशेष विधि को निकाला। और नीचे की चार ऋचाओं द्वारा सोम रस निकालाः— यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे । इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः ॥५॥ उत्तस्मते वनस्पते......(६) आयजी वाजसातमा......(७) तानो अद्य वनस्पती......(८) (ऋ० १।२८।५-८) और नीचे के मंत्र से उसे द्रोणकलश में रक्खाः—

४३६ [ सातवीं पञ्चिका उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आसृज । निधे हि गोरधि त्वचि ॥ (ऋ० १।२८।६) और इस सूक्त के पहले चार मन्त्रों द्वारा स्वाहा जोड़कर (ऋ० १।२८।१-४) उसने सोम यज्ञ किया । यत्र ग्रावा पृथुबुध्न......(१) यत्र द्वाविव जघना......(२) यत्र नार्य पच्यव......(३) यत्र मन्थां विवध्नते......(४) (ऋ० १।२८।१-४) अब यह अवभृथ अर्थात् यज्ञ की अन्तिम क्रिया के निमित्त सामग्री लाया । और उसने नीचे के दो मंत्रों से आहुतियाँ दीं :— त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्...(४) स त्वंनो अग्नेऽवमो......(५) (ऋ० ४।१।४-५) जब यह कृत्य समाप्त हो गया तो शुनःशेप ने हरिश्चन्द्र को आहवनीय के पास बुलाकर नीचे का मंत्र पढ़ा:— शुनश्चिच्छेपं निदितं सहस्रात्... , ऋ० ५।२।७) अब शुनःशेप विश्वामित्र की गोद में जाकर बैठ गया । सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, "ऋषि, मेरे पुत्र को मुझे दो" । उसने कहा, "नहीं । देवों ने इसे मुझे दिया है (अरासत) । तब से उसका नाम "देवरात वैश्वामित्र" हो गया । उसके 'कापिलेय' और 'बाभ्रव' मन्त्र हैं । सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, "हम दोनों ( तेरे मा बाप ) तुझे बुलाते हैं । तू आंगिरस गोत्र का अजीगर्त का पुत्र ऋषि है । हे ऋषि, तू अपने बाप दादों के घर को मत छोड़ । हमारे पास आ" । शुनःशेप ने कहा, "मैंने तेरे हाथ में वह चीज देखी है जो शूद्र भी नहीं लेता ( अर्थात् पुत्र के मारने के लिये तलवार ) ।

तीसरा अध्याय ] ४३७ हे अंगिरा के पुत्र, तूने तीन सौ गायों को मुझसे अधिक समझा”। सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, “हे तात, मैं अपने किये पर दुखी हूँ। मैं उसका निवारण करता हूँ। मैं सौ गायें तुझे देता हूँ”। शुनःशेप ने कहा, “जो एक बार पाप कर सकता है, वह दूसरी बार भी पाप कर सकता है। तू शूद्रत्व से मुक्त नहीं है। जो पाप तूने किया है वह किसी प्रकार निवृत्त नहीं हो सकता”। विश्वामित्र ने टोक कर कहा, “हाँ, निवृत्त नहीं हो सकता”। विश्वामित्र ने कहा, “यह सुयवस का पुत्र जब हाथ में तलवार लिये मारने को तैयार था उस समय बड़ा भयानक लगता था। इस लिये तू उसका पुत्र मत बन। मेरा पुत्र हो जा।” तब शुनःशेप ने पूछा, “हे राजपुत्र, कहो कि मैं अंगिरा का पुत्र आपके गोत्र में कैसे आ सकता हूँ?” विश्वामित्र ने कहा, “तू मेरे पुत्रों में ज्येष्ठ हो। तेरी सन्तान श्रेष्ठ हो। तू मेरे दाय भाग का अधिकारी होगा। मैं मन्त्रों से तुझे पुत्र बनाता हूँ।” शुनःशेप ने कहा “हे भरत-ऋषभ, तू अपने पुत्रों से कह दे कि वे मुझे प्रीति से स्वीकार करें। तब मैं तेरा पुत्र बन जाऊँगा।” तब विश्वामित्र ने अपने पुत्रों से कहा, “हे मधुच्छन्दा, ऋषभ, रेणु और अष्टक, और जो तुम्हारे भाई लोग हैं, वे सुनें कि इसको अपना ज्येष्ठ समझो”। (५) १८—विश्वामित्र ऋषि के १०० पुत्र थे। पचास मधुच्छन्दा से बड़े और पचास छोटे। बड़ों को अच्छा न लगा। तब

४३८ [ सातवीं पञ्चिका विश्वामित्र ने उनको शाप दिया, "तुम्हारी संतान अभक्ष्य वाली होगी"। इस प्रकार अन्ध्र, पुण्ड्र, शबर, पुलिंद आदि दस्यु लोग विश्वामित्र की औलाद हैं। लेकिन मधुच्छन्दा और उसके पचास भाइयों ने कहा, "हमारे पिता जी जो कुछ कहेंगे हम उसी को मानेंगे। हम तुझको ज्येष्ठ मानते हैं। और हम तेरा अनुसरण करेंगे"। विश्वामित्र इस उत्तर से प्रसन्न हुआ और उसने इस मन्त्रों से इन लड़कों की स्तुति की" । "मेरे पुत्रो, तुम पशु और सन्तान से फूलो फलो। तुमने मेरा कहा मानकर मुझे पुत्र वाला बनाया"। "हे गाधि के पुत्रो तुम पुत्रवान् होगे और देवरात के संरक्षण में फूलो फलोगे। वह तुमको सत्य के मार्ग पर ले चलेगा"। 'हे कुशिक के पुत्रो, वीर देवरात के अनुचर बनो। यह तुम्हारा पथप्रदर्शक होगा और हमारी विद्या का वारिस होगा"। "विश्वामित्र के सब सच्चे पुत्र और गाथी के पौत्र जो देवरात के साथ हुये उनको धन, यश, और कीर्त्ति की प्राप्ति हुई"। इस प्रकार देवरात दो ऋषियों का वारिस हुआ। जह्नु के वंश की सम्पत्ति का और गाथि के वंश की विद्या का। यह सौ से अधिक ऋचाओं में शुनःशेप का आख्यान है। होता स्वर्ण के आसन पर बैठ कर अभिषेक के पश्चात् राजा को इसका उपदेश करता है। और अध्वर्यु भी स्वर्ण के आसन पर बैठता है। क्योंकि स्वर्ण यश है, इससे राजा को यश प्राप्त होता है। होता जब कोई ऋचा पढ़ता है तो अध्वर्यु कहता है 'ओ३म्' और जब होता गाथा कहता है तो अध्वर्यु

तीसरा अध्याय ] ४३९ उत्तर देता है “एवं तथा” । 'ओम्' दैवी है और 'तथा' मानुषी । इस दैवी और मानुषी उत्तर से अध्वर्यु राजा को पाप और दोष से मुक्त कर देता है । इस लिए जो कोई राजा विजयी हो (और उसने युद्ध में हत्या की हो) वह चाहे यज्ञ न करे शुनः- शेप की कथा सुने । ऐसा करने से पाप का लेशमात्र न रहेगा । वह आख्याता (होता) को हज़ार गायें दे और प्रतिगरिता (अध्वर्यु) को सौ । और हर एक को वे स्वर्ण के आसन भी । होता को इसके सिवाय खच्चरों सहित चाँदी का रथ । जिनको सन्तान की कामना हो वह भी शुनःशेप की कथा सुनें । उनको अवश्य ही सन्तान की प्राप्ति होगी । (६) ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।

चौथा अध्याय १९. प्रजापति ने यज्ञ रचा। यज्ञ रचकर ब्रह्म और क्षत्र हुये। ब्रह्म और क्षत्र के पीछे दो प्रकार की प्रजा हुई, एक हुताद् (यज्ञ शेष को खाने वाले) और दूसरे अहुताद् (यज्ञ शेष को न खाने वाले)। ब्रह्म हुताद् हुये और क्षत्र अहुताद्। जो ब्राह्मण हुये वह हुताद् हुये और जो क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र हुये वह अहुताद्। यज्ञ उन दोनों से भागा। ब्रह्म और क्षत्र ने उनका अनुसरण किया। जो ब्रह्म के आयुध थे उनको ब्रह्म ने लिया और जो क्षत्र के आयुध थे उनको क्षत्र ने लिया। जो यज्ञ के आयुध हैं, वही ब्रह्म के आयुध हैं। क्षत्र के आयुध यह हैं—घोड़ा, रथ, कवच, बाण, धनु। क्षत्र ने यज्ञ का पीछा तो किया पर कर न सका, इसलिये लौट आया क्योंकि क्षत्र के आयुधों से डर कर यज्ञ का पीछा किया और पा लिया। ब्रह्म यज्ञ को मार्ग में घेर ( ४४० )

चौथा अध्याय ] ४४१ कर खड़ा हो गया। यज्ञ भी घिर कर खड़ा हो गया और ब्रह्म के हाथ में अपने ही आयुध देखकर ब्रह्म के पास लौट आया। चूँकि यज्ञ ब्रह्म के ही साथ रहा इसलिये ब्राह्मण ही यज्ञ करते हैं। क्षत्र ने अब ब्रह्म का पीछा किया और कहा, "मुझे इस यज्ञ को दे।" उसने कहा, "अच्छा, अपने आयुध रख दो और ब्रह्म के आयुध ले लो। ब्रह्म का रूप बनकर यज्ञ के पास जाओ।" क्षत्र ने कहा, "अच्छा" और क्षत्र के आयुध रख दिये और ब्रह्म के आयुध ले लिये और ब्रह्म का रूप धारण करके यज्ञ को प्राप्त कर लिया। इसलिये क्षत्रिय भी जब क्षत्रिय के आयुध रख देता है और ब्राह्मण के (यज्ञ संबन्धी) आयुध ग्रहण कर लेता है तो यज्ञ का अधिकारी हो जाता है। (१) २०—अब राजा से देव यज्ञ करने की याचना करनी चाहिये। इस पर प्रश्न होता है कि जिस ब्राह्मण, क्षत्रिय, या वैश्य की दीक्षा होने को होती है वह राजा से देव यज्ञ का स्थान माँगता है तो यदि राजा यज्ञ करे तो वह किससे स्थान की याचना करे। इसका उत्तर देते हैं कि "दिव्य क्षत्र से।" यह दिव्य क्षत्र आदित्य है क्योंकि आदित्य ही दिव्य क्षत्रों का अधिपति है। जिस दिन राजा को दीक्षा लेनी हो, उस दिन प्रातःकाल सूर्य की ओर मुख करके खड़ा हो और कहे :- इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम् ।-- (ऋ० १०।१७०।३) देव सवितर्देवयजनं मे देहि देव याज्यायां ।... इससे वह "देव यजन" अर्थात् यज्ञ के स्थान की याचना करता है। आदित्य उत्तर की ओर चलता जाता है और कहता है, "हाँ मैं देता हूँ।" इस प्रकार जिसको आदित्य स्थान दे देता है उसका कोई अहित नहीं कर सकता।

४४२ [ सातवीं पञ्चिका जिस राजा को इस प्रकार याचना करके यज्ञ का स्थान मिल गया और जिसने इन मंत्रों का पाठ कर लिया उसकी श्री दिन प्रति दिन बढ़ेगी। उसे प्रजाओं का ऐश्वर्य और आधिपत्य भी सदैव प्राप्त रहता है। ( २ ) २१—अब इष्टापूर्त-परिज्यानि आहुतियाँ देवें। यह आहु- तियाँ दीक्षा से पहले ही देनी चाहियें। यह चार घी की आहु- तियाँ आहवनीय में दी जाती हैं। यह कहकर :— इष्टापूर्तस्या परिज्यान्त्यै पुनर्न इन्द्रो मघवा ददातु । ब्रह्म पुनरिष्टं पूर्तं दात् स्वाहा । “इन्द्र मघवा इस आहुति का पूरा प्रति फल दे। ब्रह्म इस आहुति का पूरा फल दे।” अब पशु को बाँधने के लिये जो समिष्ट यजु पढ़ने चाहियें उनको पढ़ने के पश्चात् यह मंत्र पढ़े :— पुनर्नो अग्निर्जातवेदा ददातु । क्षत्रं पुनरिष्टं पूर्तं दात् स्वाहा । यह दोनों इष्टापूर्त-परिज्यानि आहुतियाँ हैं जिनको दीक्षा पाने वाले क्षत्रिय को देनी चाहियें। इसलिये यह दोनों आहुतियाँ देनी चाहियें। ( ३ ) २२—आराह्न के पुत्र सौजात का कहना है कि अजीत पुनर्वणथ की यह दो आहुतियाँ इच्छा पर निर्भर हैं। चाहे तो दे। जो इस कथन के अनुसार आहुतियाँ दे वह यह पढ़े :— ब्रह्म प्रपद्ये ब्रह्म मा क्षत्राद् गोपाय तु ब्रह्मणो स्वाहा । यह ऐसा ही है। जो यज्ञ को करता है वह ब्रह्मा को प्राप्त करता है 'यज्ञ ब्रह्म है। जो दीक्षा लेता है वह यज्ञ से फिर जन्मता है। जो ब्रह्मप्रपन्न है उसको क्षत्र नहीं छोड़ सकता । यह जो कहा “ब्रह्म मा क्षत्राद् गोपायतु” इसका अर्थ है कि ब्रह्म मुझे क्षत्र से

चौथा अध्याय ] ४४३ बचावे । 'ब्रह्मणे स्वाहा' कहकर वह ब्रह्म को प्रसन्न करता है । यह प्रसन्न हुआ ब्रह्म क्षत्र से रक्षा करता है । अब पशु के बाँधने का समिष्ट-यजु पढ़ने के पश्चात् पढ़ता है :— “क्षत्रं प्रपद्ये॒ क्षत्रं मा ब्रह्मणो गोपायतु । क्षत्राय॒ स्वाहा॑” । ऐसा ही होता भी है । जो क्षत्र को प्राप्त होता है वह राष्ट्र को प्राप्त होता है । क्षत्र ही राष्ट्र है । जो क्षत्र से प्रपन्न है उसे ब्रह्म नहीं सताता । 'क्षत्राय स्वाहा' से क्षत्र को प्रसन्न करता है । इस प्रकार प्रसन्न होकर वह ब्रह्म से रक्षा करता है । यह दोनों आहुतियाँ इष्टापूर्त्त की कमी से बचने के लिये हैं । इन दोनों आहुतियों को देना चाहिये । (४) २३—क्षत्र का देवता इन्द्र है और छन्द त्रिष्टुभ्, स्तोम वह है जिसमें १५ ऋचायें हैं । राज्य के हिसाब से क्षत्र सोम है, सम्बन्ध से राजा । जब मृग चर्म धारण करके दीक्षा का व्रत लेता है और ब्राह्मण उसके चारों ओर रहते हैं तब वह ब्राह्म- णता को प्राप्त हो जाता है । ऐसे दीक्षा पाने वाले से इन्द्र इन्द्रिय लेता है, त्रिष्टुभ् वीर्य, पंद्रह स्तोम आयु, सोम राज्य, पितर यश और कीर्ति । क्योंकि लोग कहते हैं, यह हम से अलग हो गया, यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म हो गया है । अब वह दीक्षा से पहले आहुतियों को देकर आहवनीय के पास आकर कहता है :— "मैं इन्द्र देवता को नहीं छोड़ता, न त्रिष्टुभ् छन्द को, न १५ स्तोमों को, न सोम राजा को, न पितरों के सम्बन्ध को । इन्द्र मुझ से इन्द्रिय न ले, त्रिष्टुभ् वीर्य न ले, १५ स्तोम आयु न लें, सोम राजू न ले, पितर यश और कीर्ति न लें । मैं इन्द्रिय, वीर्य, आयु, राज्य, यश और कीर्ति से युक्त होकर अग्नि देवता

ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति को ले लेते हैं, यह कह कर कि

४४४ [ सातवीं पञ्चिका को प्राप्त करता हूँ। मैं गायत्री छन्द, तीन स्तोम, सोम राजा, और ब्रह्म को प्राप्त होता हूँ, मैं ब्रह्म हो गया हूँ।” जब आहवनीय के पास खड़ा होकर वह यह आहुति देता है तो उसके क्षत्र होने पर भी इन्द्र उससे इन्द्रिय नहीं लेता, न त्रिष्टुभ् वीर्य, न १५ स्तोम आयु, न सोम राज्य, और न पितर यश और कीर्ति। (५) २४—क्षत्रिय अग्नि देवता से दीक्षित होता है, गायत्री छन्द से, त्रिवृत स्तोम से, ब्राह्मण के सम्बन्ध से। यज्ञ को समाप्त करने पर वह क्षत्रिय हो जाता है। अग्नि उससे तेज ले लेता है, गायत्री वीर्य ले लेती है, त्रिवृत स्तोम आयु और ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति को ले लेते हैं, यह कह कर कि अब यह हम से भिन्न हो गया, अब यह क्षत्रिय है। अब यह क्षत्र में परिवर्तित हो गया है। (तात्पर्य यह है कि यज्ञ के समय उसमें ब्रह्मत्व आ गया था। अब वह फिर क्षत्रिय हो गया)। पशु बंधन सम्बन्धी समिष्ट यजु की आहुतियां देने के पश्चात् वह आहवनीय के पास आवे और कहे, “मैं अग्नि देवता को छोड़कर नहीं जा रहा, न गायत्री छन्द को, न त्रिवृत स्तोम को। न ब्रह्म के सम्बन्ध को। मुझ से अग्नि तेज को न ले, गायत्री वीर्य को न ले, त्रिवृत स्तोम आयु को न ले, ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति को न लें। तेज, वीर्य, आयु, ब्रह्म, यश और कीर्ति के साथ मैं इन्द्र के पास आता हूँ। और त्रिष्टुभ् छन्द के पास और १५ स्तोम के पास, सोमराजा के पास, मैं क्षत्रत्व में प्रवेश करता हूँ। मैं क्षत्रिय हुआ जाता हूँ। “हे देवपितर, हे पितर देव, जो मैं हूँ उसी रूप में यज्ञ करता हूँ (अर्थात् क्षत्रिय के रूप में, न कि ब्राह्मण के रूप में)। जो

ब्राह्मण क्षत्रिय के पुरोहित की जगह पर है। पुरोहित क्षत्रिय

चौथा अध्याय ] ४४५ मैंने इष्टि की वह मेरी है। मैंने अपनी ही चीज़ की पूर्ति की है, जो तप किया है वह मेरा ही है। अपनी ही चीज़ की आहुति दी है। इस मेरी बात का उपद्रष्टा ( साक्षी ) अग्नि है। उपश्रोता ( सुनने वाला ) वायु है, और आदित्य अनुख्याता है। मैं जो हूँ सो ही हूँ'। जब वह ऐसा कहता है और क्षत्रिय बनकर आहवनीय में आहुति देता है उससे अग्नि तेज नहीं लेता, गायत्री वीर्य नहीं लेती, त्रिवृत् स्तोम आयु नहीं लेता, ब्राह्मण ब्रह्म, यश और कीर्ति नहीं लेते। (६) २५—यहाँ प्रश्न करते हैं कि जब ब्राह्मण की दीक्षा होने को होती है तो कहा जाता है कि "ब्राह्मण की दीक्षा होगी"। जब क्षत्रिय की दीक्षा हो तो क्या कहना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि कहा तो यही जायगा कि "ब्राह्मण की दीक्षा होगी" लेकिन क्षत्रिय के पुरोहित के ऋषि का नाम लें। ऐसा ही होता है। चूँकि उसने अपने ( क्षत्रियत्व के ) आयुध छोड़ कर ब्राह्मण के आयुध ग्रहण किये और ब्राह्मण हो कर यज्ञ किया इसलिये क्षत्रिय के पुरोहित के ऋषि की दीक्षा का नाम लिया जाता है और उसी का प्रवर कहा जाता है। (७) २६—अब यजमान-भाग का प्रश्न है कि क्षत्रिय खावे या न खावे। अगर खावे तो पापी होवे क्योंकि वह अहुताद है। अगर न खावे तो यज्ञ से अलग हो जाय क्योंकि यजमान- भाग यह है। इसको ब्राह्मण पुरोहित को देना चाहिये। क्योंकि ब्राह्मण क्षत्रिय के पुरोहित की जगह पर है। पुरोहित क्षत्रिय का आधा है, वह अपने मुँह में नहीं खाता तो भी पुरोहित का खाया हुआ उसी के खाये के बराबर हो जाता है। यह जो ब्रह्म है वह साक्षात् यज्ञ है। सब यज्ञ ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित है। यजमान यज्ञ में ही प्रतिष्ठित है। वह यज्ञ में यज्ञ को डालते

४४६ [ सातवीं पञ्चिका हैं जैसे जल में जल या अग्नि में अग्नि डाली जाती है। इसमें न तो अत्याचार है न यजमान को कोई हानि पहुँचती है। इस- लिये यह यजमान का भाग ब्राह्मण को देना चाहिये। कुछ ऋत्विज इसकी अग्नि में यह पढ़ कर आहुति दे- देते हैं। प्रजापते र्विभान्नाम लोकस्तस्मिंस्त्वादधामि सह यजमानेन स्वाहा। परन्तु ऐसा न करना चाहिये। यजमान भाग यजमान ही है। इसलिये जो यजमान भाग को अग्नि में छोड़ता है वह यजमान को अग्नि में छोड़ता है। (जिसको ऐसा करते देखे) उससे कहे "तूने यजमान को अग्नि में जला दिया। उसके प्राण अग्नि जला देगी और वह मर जायगा।" सदा ऐसा ही होता है। इसलिये ऐसा न करना चाहिये।(८) ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ।

पाँचवाँ अध्याय २७-सुपद्मा के लड़के विश्वतर ने श्यापर्णों को यज्ञ के अधिकार से वंचित कर दिया। उन श्यापर्णों ने यह सुना तो उसके यज्ञ में जाकर वेदी के भीतर बैठ गये। उनको देखकर विश्वन्तर ने कहा, “यह पाप कर्म करने वाले यहाँ बैठे हैं। यह दूसरे का नाम डुबोते हैं। इनको निकाल दो और वेदी के भीतर मत बैठने दो।” नौकरों ने सुन कर उनको निकाल दिया।' वे उठकर चिल्लाने लगे, “परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने जब कश्यपों के बिना यज्ञ करना आरंभ किया तो कश्यपों में से असितमृग लोगों ने भूतवीरों को (जो कश्यपों के स्थान में यज्ञ के लिये बुलाये गये थे) यज्ञ से निकाल दिया। यह असितमृग लोग वीर थे। क्या हम में भी कोई ऐसा बलवान है जो इस सोमपान को जीत ले (अर्थात् हमको यज्ञ में से वंचित न होने दे)!” ( १४७ )