भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 592 में से

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तीसरा अध्याय ४२९ ( ३ ) सदा पिता लोग पुत्र के द्वारा आपत्तियों को पार करते हैं । आत्मा आत्मा से उत्पन्न होता है । पुत्र एक अच्छी तारने वाली नौका है । ( ४ ) लोग ऐसा कहते हैं कि मल-युक्त रहने, बकरी का चमड़ा पहनने या दाढ़ी मूँछ रखने या तप करने से क्या लाभ ? ( अर्थात् अविवाहित रहने से कुछ लाभ नहीं )। हे ब्राह्मणो ! पुत्र की इच्छा करो । ( ५ ) अन्न प्राण देता है, कपड़ा रक्षा करता है, स्वर्ण रूप देता है । विवाह से पशु मिलते हैं, स्त्री सखा है । दुहिता कृपा का पात्र है । परन्तु पुत्र उस लोक में भी ज्योति है । ( ६ ) पति स्त्री में गर्भ के रूप में प्रविष्ट होता है । उसमें फिर नया जन्म लेकर दसवें मास में उत्पन्न होता है । ( ७ ) स्त्री तभी "जाया" होती है जब पुरुष उसमें पुत्र होकर जनमाता है । जो बीज उसमें रक्खा जाता है वह वृद्धि पाकर उपजता है । ( ८ ) देवों और ऋषियों ने पहले उसे तेज-युक्त कर दिया, फिर देवों ने मनुष्यों से कहा कि यह अब तुम्हारी जननी है अर्थात् तुम इसके द्वारा उत्पन्न हो । ( ९ ) जिसके पुत्र नहीं उसका लोक नहीं । इसको सब पशु जानते हैं । इसलिये वहाँ मा और बहिन के साथ भी पुत्र समागम करता है । (१०) जिनके पुत्र होते हैं वे शोक रहित होकर बड़े चौड़े चकले मार्ग पर चलते हैं । पशु और पक्षी भी इस बात को जानते हैं और वे अपनी माता तक से समागम करते हैं । (१)

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