ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] ४३१ भी हो गया । अब तू इससे मेरा यज्ञ कर" । उसने कहा, "अच्छा", और पुत्र को बुलाया । और उससे कहा, "जिसने तुझको मुझे दिया उसके लिये मैं तुझे यज्ञ में दूंगा" । उसने इनकार किया और धनुष लेकर चला गया और साल भर तक जंगल में फिरता रहा । (२) १५-अब वरुण ने इक्ष्वाकु की संतान अर्थात् हरिश्चन्द्र को पकड़ लिया । और उसका पेट फूल गया । इस बात को रोहित ने सुना और जंगल से गांव में आया । वहाँ इन्द्र पुरुष के रूप में मिला और उससे बोला, "हे रोहित, हमने सुना है कि जो यात्रा नहीं करता उसको श्री नहीं मिलती । मनुष्यों में रहते-रहते अच्छा आदमी भी बुरा हो जाता है । इन्द्र उसीका सखा है जो विचरता रहता है । इसलिये तू विचरता ही रह" । रोहित ने सोचा कि ब्राह्मण ने मुझसे विचरने को कहा है । इसलिए वह दूसरे वर्ष बन में विचरता रहा । जब बन से आकर वह एक गाँव में घुसा, इन्द्र ने पुरुष के रूप में उससे मिलकर कहा, "जो विचरता है उसके पैर फूलयुक्त होते हैं । उसका आत्मा फल को उगाता और काटता है और भ्रमण के श्रम से उसके सब पाप छूट जाते हैं । इसलिये तू विचरता ही रह" । रोहित ने सोचा कि ब्राह्मण ने मुझे विचरने के लिये कहा है, इस लिये वह तीसरे साल भी वन में विचरता रहा । जब वह बन से आकर गाँव में घुसने लगा तो इन्द्र ने पुरुष के रूप में मिलकर उससे कहा, "बैठे हुये का भाग्य बैठता है, खड़े हुये का खड़ा होता है । जो पड़ा रहता है उसका भाग्य भी पड़ा रहता है । जो विचरता' है उसका भाग्य भी विचरता है । इसलिये तू विचरता रह" ।