भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 592 में से

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पृष्ठ 448

४३४ [ सातवीं पञ्चिका सविता ने कहा, “तू राजा वरुण के लिये बाँधा गया है। उसी के पास जा”। उसने इन ३१ मन्त्रों (ऋ० १।२४।६-१५; १।२५।१-२१) से वरुण से प्रार्थना की। वरुण ने उससे कहा, “देवों में अग्नि मुख है। और सबसे अधिक सहृदय है। उसी की स्तुति कर। तो हम तुझको छोड़ देंगे”। तब उसने अग्नि की २२ मन्त्रों से स्तुति की (ऋ०१।२६।१-१० तथा १।२७।१-१२)। अग्नि ने कहा, “विश्वेदेवों की स्तुति कर। तब हम तुझे छोड़ेंगे”। उसने विश्वेदेवों की नीचे के मंत्र से स्तुति की:— नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यः...(ऋ० १।२७।१३) विश्वेदेवों ने उससे कहा “देवों में इन्द्र सबसे अधिक ओज वाला, बल वाला, सहन वाला और पार लगाने वाला है। उसकी स्तुति कर तब हम तुझे छोड़ेंगे”। उसने इन मंत्रों से इन्द्र की स्तुति की :— यच्चिद्धि सत्य सोमपा......आदि (ऋग्वेद के पहले मंडल का २९वाँ सूक्त और ३०वें सूक्त के पहले १५ मंत्र ) इन्द्र ने प्रसन्न होकर उसको एक सोने का रथ दिया। उसने नीचे के मंत्र से इसे स्वीकार किया:— शश्वदिन्द्रः.........(ऋ० १।३०।१६) तब इन्द्र ने उससे कहा “अश्विनों की स्तुति कर। तब हम तुझे छोड़ेंगे”। उसने अगले तीन मंत्रों से अश्विनों की स्तुति की।

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