भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 455

चौथा अध्याय ] ४४१ कर खड़ा हो गया। यज्ञ भी घिर कर खड़ा हो गया और ब्रह्म के हाथ में अपने ही आयुध देखकर ब्रह्म के पास लौट आया। चूँकि यज्ञ ब्रह्म के ही साथ रहा इसलिये ब्राह्मण ही यज्ञ करते हैं। क्षत्र ने अब ब्रह्म का पीछा किया और कहा, "मुझे इस यज्ञ को दे।" उसने कहा, "अच्छा, अपने आयुध रख दो और ब्रह्म के आयुध ले लो। ब्रह्म का रूप बनकर यज्ञ के पास जाओ।" क्षत्र ने कहा, "अच्छा" और क्षत्र के आयुध रख दिये और ब्रह्म के आयुध ले लिये और ब्रह्म का रूप धारण करके यज्ञ को प्राप्त कर लिया। इसलिये क्षत्रिय भी जब क्षत्रिय के आयुध रख देता है और ब्राह्मण के (यज्ञ संबन्धी) आयुध ग्रहण कर लेता है तो यज्ञ का अधिकारी हो जाता है। (१) २०—अब राजा से देव यज्ञ करने की याचना करनी चाहिये। इस पर प्रश्न होता है कि जिस ब्राह्मण, क्षत्रिय, या वैश्य की दीक्षा होने को होती है वह राजा से देव यज्ञ का स्थान माँगता है तो यदि राजा यज्ञ करे तो वह किससे स्थान की याचना करे। इसका उत्तर देते हैं कि "दिव्य क्षत्र से।" यह दिव्य क्षत्र आदित्य है क्योंकि आदित्य ही दिव्य क्षत्रों का अधिपति है। जिस दिन राजा को दीक्षा लेनी हो, उस दिन प्रातःकाल सूर्य की ओर मुख करके खड़ा हो और कहे :- इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम् ।-- (ऋ० १०।१७०।३) देव सवितर्देवयजनं मे देहि देव याज्यायां ।... इससे वह "देव यजन" अर्थात् यज्ञ के स्थान की याचना करता है। आदित्य उत्तर की ओर चलता जाता है और कहता है, "हाँ मैं देता हूँ।" इस प्रकार जिसको आदित्य स्थान दे देता है उसका कोई अहित नहीं कर सकता।