ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपांचवाँ अध्याय ] १४५ सुशमित्" वायु है । वायु अपने द्वारा अपने को और जो कुछ संसार में है उसको प्रज्वलित करता है । इसके द्वारा वह अन्त- रिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब कहता है :- "होता देववृतः" "देवों से वरण किया हुआ होता" । देवों से वरण किया हुआ होता वह ( स्वर्गीय ) अग्नि है । क्योंकि वह हर जगह देवों से वरण किया हुआ है । इस प्रकार वह उस लोक में उस पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब वह कहता है :- "होता मनुवृतः" "मनुष्यों से वरण किया गया होता ।" मनुष्यों से वरण किया हुआ होता यह (इस लोक की) अग्नि है । क्योंकि यह अग्नि हर जगह मनुष्यों द्वारा वरण की जाती है । इस प्रकार होता इस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब वह कहता है :- "प्रणीर्यज्ञानाम्" "यज्ञों को ले जाने वाला" । वायु यज्ञों का ले जाने वाला है । जब वह चलता है तब यज्ञ होता है तभी अग्निहोत्र होता है । इस प्रकार अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब कहता है :- "रथीरध्वराणाम्" "अध्वरों का रथी ।" अध्वरों का रथी वह (सूर्य्य) है । क्योंकि वह रथी के समान चलता है । इस प्रकार होता इस अग्नि पर इस लोक में आधिपत्य प्राप्त करता है । १०