भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१४४ [ दूसरी पञ्चिका वर्ष के पश्चात् उसने बारह पद कहे, यही बारह निविद् के पद हैं। निविद् कहने के पश्चात् सब प्राणी उत्पन्न हुये। इसको (कुत्स) ऋषि ने नीचे का मन्त्र पढ़ते हुये देखा— स पूर्वया निविदा कव्यतायोरिमाः प्रजा अजनयन्मनूनाम्। विव- स्वता चक्षसा द्यामपश्च देवा अग्निं धारयन् द्रविणोदाम्॥ (ऋ० १।९६।२) "उस अग्नि ने पहले निविद् से और काव्य से मनुष्यों की प्रजा को उत्पन्न किया। हर जगह चमकते हुये प्रकाश से द्यौ और जलों को उत्पन्न किया। देवों ने धन देने वाले अग्नि को धारण किया।" इसीलिये जब होता सूक्त से पहले निविद् को कहता है तो उसे सन्तान का लाभ होता है। जो इस रहस्य को समझता है उसको सन्तान और पशु की प्राप्ति होती है। (१) ३४—होता कहता है : “अग्निर्देवेद्धः” "अग्नि देवों से प्रज्वलित की गई"। देवों की प्रज्वलित की हुई वह (स्वर्गीय) अग्नि है क्योंकि उसको देवों ने प्रज्वलित किया है। इसी के द्वारा वह उस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब कहता है : “अग्निर्मन्विद्धः” "अग्नि मनुष्यों द्वारा प्रज्वलित की गई।" मनुष्यों से प्रज्वलित की गई अग्नि यह (पृथ्वी) की अग्नि है। क्योंकि मनुष्यों ने इसे जलाया है। इसके द्वारा वह इस लोक की अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :— “अग्निः सुसमिद्” "अग्नि जो अच्छी तरह प्रज्वलित करता है"। यह "अग्निः