भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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१६० [ तीसरी पञ्चिका इससे वायु के ग्रह की स्तुति की जाती है । नीचे के तीन इन्द्र-वायु वाले मंत्र पढ़ता है :- इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतम्। इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू। तावा यातमुप द्र॒वत् ॥ वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम्। मक्ष्वित्था धिया नरा ॥ ( ऋ० १।२।४-६ ) यह इन्द्र-वायु के ग्रह की स्तुति हुई । नीचे के तीन मित्रा-वरुण के मंत्र पढ़ता है :- मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्। धियं घृताचीं साधन्ता ॥ ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥ कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥ ( ऋ० १।२।७-६ ) इससे मित्रावरुण के ग्रह की स्तुति हुई । नीचे के तीन मंत्र दो अश्विनों के लिये पढ़े गये :- अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत् पाणी शुभस्पती । पुरुभुजा चनस्यतम् ॥ अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया । धिष्ण्या वनतं गिरः ॥ दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः । आ यातं रुद्रवर्तनी ॥ ( ऋ० १।३।१-३ ) इससे अश्विनों के ग्रहों की स्तुति की गईँ । नीचे के तीन इन्द्र के मंत्र पढ़ता है :- इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः । अण्वीभिस्तना पूतासः ॥ इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः । उप ब्रह्माणि वाघतः ॥ इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्व नश्चनः ॥ ( ऋ० १।३।४-६ ) इससे शुक्र और मन्थी ग्रह की स्तुति हुई । अब विश्वेदेवों के तीन मंत्र पढ़ता है :- ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वेदेवास आ गत । दाश्वांसो दाशुषः सुतम् ॥