भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 592 में से

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पहला अध्याय ] १६१ विश्वे देवासो अप्तुरः सुतमा गन्त तूर्णयः । उस्रा इव स्वसराणि ॥ विश्वे देवासो अस्निध एहि मायासो अद्रुहः । मेधं जुषन्त वह्नयः ॥ ( ऋ० १।३।७-९ ) इससे आग्रायण ग्रह की स्तुति हुई । अब सरस्वती के तीन मंत्र पढ़ता है :— पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥ चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनां । यज्ञं दधे सरस्वती ॥ महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना । धियो विश्वा वि राजति ॥ ( ऋ० १।३।१०-१२ ) कोई सरस्वती का ग्रह ही नहीं । सरस्वती वाणी है । वाणी से जो कोई ग्रह लिये जाते हैं उन्हीं की इन शब्दों से स्तुति हो जाती है । जो इस रहस्य को समझता है वह कीर्ति पाता है । (१) २—यह जो प्रउग है इससे अन्न की प्राप्ति करता है । प्रउग में अन्य देवता की स्तुति होती है । और प्रउग में अन्य का ही कृत्य होता है । जो इस रहस्य को समझता है वह ग्रहों में अन्यान्य खाद्य पदार्थों को रखता है । यह जो प्रउग शस्त्र है वह यजमान का सबसे निकटस्थ सम्बन्धी है । इस लिये उसको इसका बहुत ध्यान रखना चाहिये । ऐसा कहा जाता है, क्योंकि इसी से होता संस्कार करता है । वह वायु के तीन मंत्रों को पढ़ता है । इसीलिये कहते हैं कि वायु प्राण है । प्राण वीर्य है । शरीर में वीर्य पहले उत्पन्न होता है, फिर मनुष्य पैदा होता है । यह जो वायु के मंत्रों को पढ़ता है उससे यजमान में प्राण का संस्कार करता है । इन्द्र और वायु के तीन मंत्र इसलिये पढ़ता है कि जहाँ प्राण है, वहाँ अपान है । इनके पढ़ने से यजमान में प्राण और अपान का संस्कार करता है । ११

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