भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

पहला अध्याय ] १६५ यह जो एक अग्नि को कई जगह ले जाकर कई भाग कर देते हैं यह उसका विश्वेदेवों का रूप है। इस प्रकार विश्वेदेवों के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। जब अग्नि शोर करके बातचीत करने के समान जलता है, यह उसका सरस्वती रूप है। इस प्रकार होता सरस्वती के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। इस प्रकार जिन तीन-तीन मंत्रों को पढ़ते हैं उनमें भिन्न- भिन्न देवते होते हुये भी सामगान करने वाली स्तुति को वायु के मंत्र से आरंभ करके अनुकूलता दिखाते हैं। विश्वेदेवों के लिये शस्त्र पढ़कर नीचे का याज्य विश्वेदेवों के प्रति पढ़ता है :- विश्वेभिः सोम्यं मध्वऽग्न इन्द्रेण वायुना। पिबा मित्रस्य धामभिः ॥ (ऋ० १।१४।१०) इस प्रकार सब देवतों को भाग देकर वह सन्तुष्ट करता है। (४) ५-यह जो वषट्कार है वह देवों का पात्र है। वषट्कार रूपी देवपात्र से वह देवतों को तृप्त करता है। अनुवषट्कार से वह देवों को पुनः तृप्त करता है, जैसे लोग घोड़ों या गायों को बार बार घास या पानी देते हैं। इस पर शंका करते हैं कि जिस अग्नि में पहले आहुति दी थी उसी में फिर क्यों आहुति देते हैं और धिष्ण्या अग्नि के पास वषट्कार करते हैं ? इसका उत्तर यह है कि अनुवषट्कार "सोमस्याग्ने वीहि" करके वह वषट्कार भी करता है और धिष्णियों को तृप्त भी करता है। प्रश्न करते हैं कि सोम का वह स्विष्टकृत भाग कौन सा है जिसमें से बिना समाप्त किये हुये भक्षण कर लेते हैं और अनु- वषट्कार करते हैं ? इसका उत्तर यह है कि 'सोमस्याग्ने वीहि'