ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६४ [ तीसरी पञ्चिका अगर वह चाहे कि उसको सब अंगों और आत्मा से युक्त रक्खूँ तो वह उन मंत्रों को यथाविधि ठीक ठीक पढ़े । इस प्रकार वह उसको सब अंगों और आत्मा से युक्त रखता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब अंगों और आत्मा से अपने को युक्त रखता है। (३) ४—यहाँ प्रश्न होता है कि जब शस्त्र स्तोत्र के अनुकूल होना चाहिये तो सामगान करने वाले जिन अग्नि वाले मंत्रों को पढ़ते हैं उनको होता वायु वाले मंत्र से कैसे प्रतिपादन करता है। अग्नि के मंत्र वायु के मंत्रों के अनुकूल कैसे हो सकते हैं ? इसका उत्तर यह है कि यह जो देवता है वह अग्नि के ही शरीर हैं। यह जो अग्नि जलता है वह उसका वायु रूप है। इस प्रकार वायु के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। अग्नि जो जलता है वह दो भागों में जलता है। इन्द्र और वायु दो हैं। यह उसका ऐन्द्र-वायु रूप है। इस प्रकार वह ऐन्द्र-वायु के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। यह जो अग्नि जलने में ऊपर नीचे होता है यह मित्र और वरुण का रूप है। इस प्रकार वह मित्रावरुण के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। अग्नि का जो भयानक स्पर्श है वह वरुण का रूप है। यह जो भयानक स्पर्श होते हुये भी मित्र के समान उसके पास बैठते हैं यह उसका मित्र रूप है। इस प्रकार वह मित्रावरुण के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। यह जो दो भुजाओं और दो अरणियों से घिस कर अग्नि जलाते हैं यह अग्नि का अश्विन-रूप है। इस प्रकार वह अश्विनों के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। यह जो बड़े जोर से बबबब करके जलता है जिससे डरकर लोग भाग जाते हैं यह उसका इन्द्र का रूप है। इस प्रकार वह इन्द्र के रूप में अग्नि की स्तुति करता है।