भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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[ ऐतरेय-ब्राह्मण ४ ईश्वर भक्त सैनिक युद्ध में घाव पाते समय इसको पढ़कर अपने को ढाढस दे सकते हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि इस श्रुति का निर्माण इस अवसर के लिये किया गया हो। एक और प्रमाण लीजिये :- अन्धस्वत्यः पीतवत्यो मदत्यस्त्रिष्टुभो याज्या भवन्त्यभिरूपा यद्यज्ञेऽ- भिरूपं तत् समृद्धम् । ( ऐतरेय० ४।१६ ) यहां प्रश्न था कि पर्यायों के याज्यों में कौन कौन मंत्र पढ़ने चाहिये। उत्तर दिया कि वह मंत्र जिनमें अंधस्, पीत और मद् शब्द आये हों। ये पाँच मंत्र इस प्रकार हैं, ऋग्वेद २।१४।१, ६।४४।१४, १०।१०४।२, ६।४०।१ और २।१९।१। यह मंत्र न तो यज्ञ की क्रियाओं के क्रम से हैं। न वेद में एक स्थल या एक प्रपाठक के हैं। केवल इसलिये छांटे गये कि इनमें 'अंधस्' 'पीत' और 'मद' शब्द आ गये। इसलिये इन मंत्रों का अर्थ समझने के लिये ऐतरेय के इस विनियोग की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों के भाष्य नहीं हैं। परन्तु उक्त विनियोग से कहीं-कहीं वेद मंत्रों के अर्थों पर प्रकाश पड़ता है। पाँचवीं पंचिका के प्रायः सभी अध्यायों में भिन्न-भिन्न दिनों में पढ़े जाने वाले मन्त्रों का उल्लेख है। उन मन्त्रों को किस प्रकार छाँटा गया है किसी विशेष अर्थ के विचार से नहीं, अपितु कुछ शब्दों के विचार से। जैसे जिनमें 'रथ' शब्द आया हो या जिनमें 'आ' या 'प्र' आया हो इत्यादि। यः प्रथमस्याह्नो रूपमेतानि वै सप्तमस्याह्नो रूपाणि इत्यादि ( ऐतरेय ५।३।१ ) इससे भी यही बात सिद्ध होती है कि वेद के मन्त्र उन

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