ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 19, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें· प्राक्कथन ] ५ कृत्यों के लिये नहीं रचे गये थे जिनका ब्राह्मण ग्रन्थों में उल्लेख हैं । केवल उनका विनियोग हुआ है । कहीं-कहीं तो स्पष्टरीत्या प्रकट हो जाता है कि विनियोग में मन्त्रों का अर्थ संकुचित या विकृत भी हो गया है । यहाँ केवल एक उदाहरण पर्याप्त होगा :— ऐतरेय ब्राह्मण के छठे अध्याय ( पंचिका २, अध्याय १ ) के १०वें खण्ड में ऐसा दिया गया है :— मनोतायै हविषोऽवदीयमान स्यान्वब्रू हीत्याहाध्वर्युः । इति त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोतेति सूक्तमन्वाह इति । इस पर सायणाचार्य लिखते हैं :— तदर्थं हृदयाद्येकादशाङ्गरूपं हविरवदीयते । तस्य हविषोऽनुकूला ऋचोऽनु ब्रूहीत्यध्वर्युः प्रैषमंत्रं पठेत् । अर्थात् अध्वर्यु कहता है कि मनोता के लिये आहुति देने के लिये जो हृदयादि ११ अंग काटे जाते हैं, उनके प्रसंग के मन्त्र पढ़ो । इस पर ऋग्वेद मंडल ६, सूक्त १ के "त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोता" आदि मन्त्र पढ़े जाते हैं । हमने अनुवाद में पूरे मन्त्र देकर उनका अर्थ दे दिया है । पाठकगण देख लें । उन मन्त्रों में कहीं भी अंगों के काटने का संकेत तक नहीं है । अर्थ उत्तम और शुद्ध हैं । कोई घातक क्रिया करने का आदेश नहीं है । फिर भी पशु-बलि के साथ उनका विनियोग करके उनके अर्थों को विकृत कर दिया गया । जो कोई यज्ञ में वध-क्रिया और मन्त्र पाठ को देखेगा यही समझेगा कि मन्त्रों में पशुबध का आदेश होगा तभी तो पढ़े जाते हैं, परन्तु ऐसा नहीं है । वैदिक साहित्य के विद्वानों में प्रायः इस बात पर मतभेद है कि ब्राह्मण ग्रन्थों की गणना वेदों में है या नहीं । हमने ऊपर जो कुछ लिखा है उससे यह गन्ध आती है कि ब्राह्मण ग्रन्थों