ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] १७५ और रुद्रों के लिये त्रिष्टुभ् को, विश्वेदेवों और आदित्यों के लिये तीसरे सवन में जगती को दिया । उसका अपना छन्द अनुष्टुभ् था । उसको उसने अन्तिम मंत्र में जो 'अच्छावाक' का मंत्र है कर दिया । इस पर अनुष्टुभ् ने कहा, "तू देवों में बड़ा पापी है कि तूने अपने ही मुझ अनुष्टुभ् छन्द को अन्त की अच्छावाकीय ऋचा में ढकेल दिया। उसने भूल स्वीकार कर ली और उसने अपना सोम यज्ञ लिया और अनुष्टुभ् को उस के पहले ही अर्थात् मुख पर ही रख दिया । इसलिये सब सवनों में पहले अनुष्टुभ् रखा जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह पहला और मुख्य हो जाता है और श्रेष्ठता को प्राप्त होता है । प्रजापति ने अपने ही सोमयाग में ऐसा किया । इसलिये ऐसा करने से यजमान यज्ञ का स्वामी हो जाता है और यज्ञ ठीक हो जाता है। जब कभी यजमान इस प्रकार यज्ञ का स्वामी होकर यज्ञ करता है वह यज्ञ जनता के लिये होता है। (२) १४—अग्नि देवताओं का होता था । मृत्यु उसके लिये बहिष्पवमान स्तोत्र में बैठा छिपा रहा । अनुष्टुभ् छन्द में आज्य शस्त्र आरंभ करके उसने मृत्यु को जीता। मृत्यु आज्य में छिप रहा । प्र-उग शस्त्र का आरंभ करके उसने मृत्यु को परास्त किया । दोपहर के सवन में वह मृत्यु (अग्नि के लिये) पवमान में बैठा रहा । उसने अनुष्टुभ् के साथ मरुत्वतीय शस्त्र आरंभ करके मृत्यु को जीता। वह उस दोपहर के सवन में बृहती छन्दों में न बैठ सका। क्योंकि बृहती प्राण हैं। इस प्रकार मृत्यु प्राणों को न ले सका। इसीलिये होता दोपहर के सवन में बृहती छन्द में स्तोत्रिय के द्वारा कहता है । बृहती प्राण हैं ऐसा करने का प्रयोजन ही प्राणों की रक्षा है ।