ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७६ [ तीसरी पञ्चिका तीसरे सवन में मृत्यु अग्नि के लिये पवमान स्तोत्र में छिपा रहा। अनुष्टुभ् के साथ वैश्वदेव शस्त्र आरंभ करके उसने मृत्यु को जीता। मृत्यु यज्ञायज्ञीय में जा छिपा। वैश्वानरीय अग्नि- मारुत सूक्त का आरंभ करके उसने मृत्यु को जीतां। वैश्वानरीय सूक्त वज्र है। यज्ञायज्ञीय साम प्रतिष्ठा है। वैश्वानरीय सूक्त को पँढ़ कर वह मृत्यु को अपने स्थान से निकाल देता है। मृत्यु के सब पाशों और सब गदाओं ( स्थाणून् ) को पार करके अग्नि छूट आया। जो होता इस रहस्य को समझता है वह सब झंझटों से छूट जाता है और पूरी आयु प्राप्त करता है। (३) १५—इन्द्र ने वृत्र को मार कर यह सोचा कि शायद मैं इसको न हरा सका, और दूर-दूर तक फिरता रहा। यहाँ तक कि वह बहुत दूर देश में पहुँचा। यह सब से दूर जगह अनुष्टुभ् है। वाणी ही अनुष्टुभ् है। वह (इन्द्र) वाणी में प्रवेश करके वहीं पड़ा रहा। सब प्राणी अलग अलग होकर उसको तलाश करते रहे। पितरों ने उसको एक दिन पहले ढूँढ़ लिया और देवों ने एक दिन पीछे। इसीलिये पितरों के लिये कृत्य एक दिन पहले किया जाता है और देवों के लिये एक दिन पीछे। उन्होंने कहा, "हम सोम निचोड़ें। इन्द्र हमारे पास शीघ्र ही आयेगा"। उन्होंने कहा "अच्छा", और सोम निचोड़ा। और नीचे का मंत्र पढ़कर उसको सोम के पास लाये :— आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि। तुविकूर्मिमृतीषहमन्द्र शविष्ठ सत्वते ॥ (ऋ० ८।६८।१) नीचे के मंत्र से इन्द्र 'सुत' शब्द के द्वारा देवताओं पर प्रकट हुआ :—