ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपांचवाँ अध्याय ] १७९ हैं ( 'धा' रखना से )। जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ बिना छिद्र या त्रुटि के पूरा हो जाता है। जिस प्रकार कपड़े को सुई से सीते हैं इसी प्रकार यज्ञ (के फटे हुये भाग) को धाय्यों से सीते हैं। इसीलिए इनको धाय्य कहते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उस यज्ञ (का फटा भाग) इन धाय्यों द्वारा सिल जाता है। यह जो धाय्य हैं वे उपसदों के उक्थ हैं। नीचे का अग्नि का मन्त्र पहले उपसद् का उक्थ है :— अग्निनेंता भग इव क्षितीनां दैवीनां देव ऋतुपा ऋतावा। स वृत्रहा सनयो विश्ववेदाः पर्षद्विश्वाति दुरिता गृणन्तम् ॥ ( ऋ० ३।२०।४ ) नीचे का सोम का मंत्र दूसरे उपसद् का उक्थ है :— त्वं सोम ऋतुभिः सुक्रतुर्भूस्त्वं दक्षैः सुदक्षो विश्ववेदाः। त्वं वृषा वृषत्वेभिर्महित्वा द्युम्नेभिर्द्युम्न्यभवो नृचक्षाः॥ ( ऋ० १।६१।२ ) नीचे का विष्णु का मंत्र तीसरे उपसद् का उक्थ है :— पिन्वन्त्यपो मरुतः सुदानवः पयोघृतवद् विदथेष्वारुवः। अत्यं न मिहे वि नयन्ति वाजिनमुत्सं दुहन्ति स्तनयन्तमक्षितम् ॥ ( ऋ० १।६४।६ ) सोम यज्ञ के द्वारा जिस किसी लोक की कामना करके उसे जीतता है वह जो इस रहस्य को समझता है धाय्यों को पढ़कर इन उपसदों द्वारा विजय पाता है। कुछ लोगों का कहना है कि ( "मिन्वन्त्यपो" इत्यादि के स्थान में ) नीचे का मंत्र पढ़ना चाहिये :— तान् वो महो मरुत एव यान् वो विष्णोरेषस्य प्रभृथे हवामहे। हिरण्यवर्णान् ककुहान् यतस्रुचो ब्रह्मयन्तः शंस्यं राध ईमहे ॥ ( ऋ० २।३४।११ )