ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८० [ तीसरी पञ्चिका उनका कहना है कि हमने भरतों को इस प्रकार पढ़ते सुना है। लेकिन यह बात माननीय नहीं है। यदि होता इसको पढ़ेगा तो मेघ को रोक देगा। क्योंकि पर्जन्य वृष्टि का स्वामी है। अगर “पिन्वन्त्यपो” पढ़ेगा तो मेघ अवश्य बरसेगा क्योंकि इस मंत्र में “अत्यं न मिहे” पद में मेघ की ओर संकेत है और पहले पद में मरुतों की ओर। 'विनियन्ति' विष्णु के लिये है इसका अर्थ है 'विक्रांत'। 'विक्रांत' वाला विष्णु है (जो तीन पग चला)। 'वाजिन' इन्द्र के लिये है। इसमें चार पद हैं, एक वर्षा के लिये, दूसरा मरुतों के लिये तीसरा विष्णु के लिये और चौथा इन्द्र के लिये। यद्यपि यह तीसरे सवन की है लेकिन दोपहर के सवन में पढ़ी जाती है। इसीलिये भरतों के पशु जो शाम को गोष्ठ में होते हैं दोपहर को संगविनी (दोपहर को धूप से बचने के स्थान) में आ जाते हैं। 'पिन्वन्त्यपो" यह जगती छन्द है। पशु भी जगती है। यजमान का आत्मा दोपहर है। इस प्रकार यजमान में पशुओं को धारण कराता है। (७) १९-वह मरुत्वतीय प्रगाथ को पढ़ता है। प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत। वृत्रं हनति वृत्रहा शतक्रतुर्व- ज्रेण शतपर्वणा ॥ (ऋ० ८।८६।३) मरुत पशु हैं। पशु ही प्रगाथ हैं। अर्थात् प्रगाथ पशुओं की प्राप्ति के लिये हैं। वह नीचे का सूक्त पढ़ता है:-- “जनिष्ठा उग्रः सहसे तुराय"...इत्यादि (ऋ० १०।७३।१-११) यह यजमान के जन्म के लिये हैं। इससे वह देवयोनि अर्थात् यज्ञ से यजमान को पैदा करता है। इससे विजय होती है। इससे यजमान जीत जाता है। अन्यथा पराजित रहता है। इस सूक्त का ऋषि “गौरिवीति” है। इस शक्ति के पुत्र गौरिवीति ने स्वर्ग लोक के पास इस सूक्त का दर्शन किया