भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 195

दूसरा अध्याय ] १८१ और इससे स्वर्ग को पाया। इस लिये यजमान भी इसके द्वारा स्वर्ग लोक को पाता है। इस सूक्त के आधे मंत्रों को पढ़कर आधों को छोड़ देता है और उनके बीच में निविद् रखता है। यह निविद् स्वर्ग को चढ़ने के लिये है। यह निविद् स्वर्ग की सीढ़ी है। इसको ठहर- ठहर कर पढ़ना चाहिये जैसे सीढ़ी पर ठहर-ठहर कर चढ़ते हैं। इस प्रकार जो यजमान उसका प्रिय हो उसको वह स्वर्ग- लोक को साथ ले चलता है। जो स्वर्ग की कामना करे वह इसको साथ लेकर चले। अगर होता यजमान को हानि पहुँचाना चाहे और सोचे कि क्षत्रिय से वैश्य का हनन करा दूँ तो वह सूक्त में (पहले, मध्य में और अन्त में) तीन बार निविद् कहे। क्योंकि निविद् क्षत्रिय है और सूक्त वैश्य। इस प्रकार वह जिसको चाहे उसके वैश्यों को क्षत्रियों द्वारा मरवा दे। इस प्रकार वह क्षत्रिय के द्वारा वैश्यों को मरवाता है। अगर वह चाहे कि वैश्य द्वारा क्षत्रिय मारा जाय तो सूक्त में निविद् के तीन वार टुकड़े कर दें। निविद् क्षत्रिय है। सूक्त वैश्य है। इस प्रकार जिसको चाहे उस क्षत्रिय को वैश्य द्वारा मरवा दे। अगर वह चाहे कि यजमान को दोनों ओर से वैश्यों या सम्बन्धियों से अलग कर दूँ तो निविद् के "शंसावोम्" द्वारा दो टुकड़े कर दे। इस प्रकार वह यजमान को उसके वैश्यों (सम्बन्धियों) से दोनों ओर अलग कर देगा (अर्थात् पूर्वजों और सन्तान दोनों) से। ऐसा वह करे जिसकी कामना दुष्ट हो। स्वर्ग की कामना वाला ठीक ठीक रीति से करे। वह इस मन्त्र से समाप्त करता है :-