ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८२ [ तीसरी पञ्चिका वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयोनाधमानाः । अप ध्वान्तमूर्णु हि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान् ॥ ( ऋ० १०।७३।११ ) प्रिय विचार वाले ऋषि लोग सुन्दर परों वाले पक्षियों के समान इन्द्र के पास गये । और प्रार्थना की कि जो अन्धकार में छिपा है उसे खोल दे । आँख को ( प्रकाश से ) भर दे । और रस्सी से बँधे हुये जैसे हमको मुक्त कर दे ।” जब कहे "अप ध्वान्तमूर्णु हि" ( अँधेरे से हटा ) उस समय मन में विचार करे कि अँधेरे से हट रहा हूँ । इस प्रकार वह अँधेरे से हट जायगा । जब कहे “पूर्धि चक्षुः” (आँख को प्रकाश से भर दे ) तो दोनों आँखें मले । जो इस रहस्य को समझता है उसकी आँखें बुढापे तक ठीक रहती हैं । "मुमुग्ध्यस्मान् निधयेव बद्धान्” में निधि का अर्थ है पाश या रस्सी । रस्सी से बँधे हुओं के समान । (८) २०—इन्द्र जब वृत्र को मारने लगा तो उसने सब देवताओं से कहा, "मेरे पास रहो । मेरी मदद करो ।” उन्होंने ऐसा ही किया । वे उसे मारने को दौड़े । उसने समझा कि यह मुझे मारने आते हैं । उसने सोचा, "मैं इनको डरा दूँ ।” उसने उनकी ओर फुसकार मार दी । वह फुसकार से डर कर भाग गये । मरुतों ने उस ( इन्द्र ) को न छोड़ा । उन्होंने उससे कहा, “भगवन् मारो ! मारो !! अपने वीर्य का परिचय दो ।” एक ऋषि ने इसको देखा और इस मंत्र को पढ़ा :— "वृत्रस्य त्वा श्वसथादीषमाणा विश्वेदेवा अजहुर्ये सखायः । मरुद्भिरिन्द्र सख्यं ते अस्त्वथेमा विश्वाः पृतना जयासि ।” ( ऋ० ८।६६।७ ) “वृत्र के फुसकार मारने पर सब देवते जो तेरे साथ थे और