ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] १८३ तेरे मित्र थे भाग गये । हे इन्द्र, अगर तुझे मरुतों की दोस्ती मिल जाय तो तू इन सब युद्धों में जीत जाये ।” इन्द्र ने सोचा, “सचमुच मरुत् मेरे सचिव हैं। ये मुझे प्यार करते हैं। मैं इनको अपने उक्थ में साझी बना लूं ।” उसने उनको इस उक्थ में साझी बनाया । पहले निष्केवल्य उक्थ में इन्द्र और मरुत दोनों साझी थे। अब मरुतों के लिये मरुत्वतीय शस्त्र अलग बना दिया गया । मरुतों का भाग यह है कि अध्वर्यु मरुत्वतीय ग्रह को ले, होता मरुत्वतीय प्रगाथ, मरुत्वतीय सूक्त और मरुत्वतीय निविद् को पढ़े । मरुत्वतीय शस्त्र को पढ़ कर मरुत्वती याज्य को पढ़े। इस प्रकार इन मरुतों की भक्ति करता है। और देवतों को उनके भागों के अनुकूल प्रसन्न करता है। मरुत्वतीय याज्य यह है :— “ये त्वा हि हत्ये मघवन्नवर्धन् ये शाम्बरे हरिवो ये गविष्टौ । ये त्वा नूतमनुमदन्ति विप्राः पिवेन्द्र सोमं सगणो मरुद्भिः” ( ऋ० ३।४७।४ ) “हे मघवन्, जिन मरुतों ने तुझे अहि ( वृत्र ) के मारने में सहायता दी; हे हरि अर्थात् घोड़ों वाले इन्द्र, जिन मरुतों ने तुझे शम्बर के युद्ध में सहायता दी, और जो विप्र तुझे अब प्रसन्न करते हैं उन मरुतों के साथ गणयुक्त होकर तू सोम पी ।” जिस जिस युद्ध में इन्द्र ने विजय पाई और अपने वीर्य का परिचय दिया वहीं वहीं उसने मरुतों को अपना साथी बताया और उनके साथ सोमपान किया । (९) २१—जब इन्द्र ने वृत्र को मार डाला और सब युद्धों को जीत लिया तो वह प्रजापति के पास गया और बोला, “मैं तुझ जैसा होना चाहता हूँ। मैं बड़ा होना चाहता हूँ ।” प्रजापति ने कहा, “कः अहम्, मैं कौन हूँ ?” इन्द्र ने कहा, “वही है जो तूने कहा ( प्रजापति ने कहा “कः”, इन्द्र ने कहा तू “कः” है) ।