ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८४ [ तीसरी पञ्चिका तभी से प्रजापति का ‘कः’ नाम हो गया। प्रजापति “कः” है। इन्द्र का नाम महेन्द्र है क्योंकि वह बड़ा हो गया। इन्द्र ने महान् होकर देवतों से कहा, “मेरा स्वागत करो, ऐसा जैसा वह लोग चाहते हैं, जो वैभवशील हैं या जो महान् हो जाते हैं”। उन्होंने कहा, “तुम्हीं बताओ कि किस प्रकार किया जाय अर्थात् तुम क्या चाहते हो?” उसने कहा, सोम का माहेन्द्र ग्रह दो, सबनों में दोपहर का सबन दो। उक्थों में निष्केवल्य दो, छन्दों में त्रिष्टुभू दो। सामों में पृष्ठ दो”। ( सामवेद के दो तृच् मिलकर पृष्ठ होते हैं)। उन्होंने यह सब दे दिये। जो इस रहस्य को समझता है उसको भी देवते यही देते हैं। देवों ने उससे कहा, “तुमने सब कुछ ले लिया। कुछ हमको भी दो”। उसने कहा, “नहीं, तुमको क्यों दें?” देवों ने कहा, “हे मघवन् हमको भी दो”। उसने उनकी ओर आँख मार दी (देखा)। (१०) २२—देव बोले, “इंद्र की प्रासहा नाम की वावाता स्त्री बहुत प्यारी है, उसी से पूछें।” (राजा की बड़ी स्त्री महिषी कहलाती है। उससे निचली वावाता। उससे निचली परिवृक्ति)। उन्होंने उससे पूछा। उसने कहा, “कल सबेरे बताऊँगी”। क्योंकि स्त्रियां जो पतियों से पूछना होता है रात को पूछती हैं। प्रातःकाल को देव उसके पास गये। उसने इनसे नीचे का मंत्र पढ़ा :— यद्वांवान पुरुतमं पुराषालावृत्रहेन्द्रो नामान्यप्राः । अचेति प्रास- हस्पतिस्तुविष्मान्यदीमुशमसि कर्तवे करत्तत् ॥ (ऋ० १०।७४।६) “अपने यश से संसार को भरने वाले, युद्धों में जीतने वाले, वृत्र को मारने वाले इन्द्र ने जो कुछ प्राप्त किया और जिसके द्वारा वह प्रासह का पति और बलवान हुआ उसीसे हम इच्छा