भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

१९२ [ तीसरी पञ्चिका आठ अक्षर की गायत्री ने पहले सवन को देवों तक उठाया। तीन अक्षर का त्रिष्टुभ् दोपहर के सवन को न उठा सका। गायत्री ने उससे कहा, "मैं ऊपर जाती हूँ। तू मेरा भी भाग दे।" त्रिष्टुभ् ने कहा, "अच्छा। तू उन पर अपने आठ अक्षर रख दे।" गायत्री राजी हो गई और अपने आठ अक्षर रख दिये। यही कारण है कि दोपहर के सवन में मरुत्वतीय शस्त्र के तृच की अन्तिम दो ऋचायें और इसके पीछे की ऋचा गायत्री की होती हैं। ग्यारह अक्षर पाकर त्रिष्टुभ् ने दोपहर के सवन को ऊपर उठा लिया। एक अक्षर की जगती तीसरे सवन को देवों तक न ले जा सकी। गायत्री ने कहा, "मैं ऊपर जाती हूँ। तू मुझे भाग दे।" जगती ने कहा, "अच्छा, मेरे ऊपर वे ग्यारह अक्षर रख दे।" गायत्री ने कहा, "अच्छा।" और वे ग्यारह अक्षर जगती पर रख दिये। इसीलिये तीसरे सवन में वैश्वदेव शस्त्र के तृच् की पिछली दो ऋचायें और उनकी अगली ऋचा गायत्री की हैं। १२ अक्षर पाकर जगती ने तीसरे सवन को देवों तक उठाया। इस प्रकार गायत्री के आठ, त्रिष्टुभ के ग्यारह और जगती के बारह अक्षर हुये। जो इस रहस्य को समझता है वह सब छन्दों द्वारा सुखी होता है। क्योंकि उनकी बराबर शक्ति और बराबर गुण हैं। जो एक था वह तीन हो गया। इसीलिये कहते हैं कि जो इस रहस्य को समझता है कि एक के तीन कैसे हो गये उसी को भेंट मिलनी चाहिये। (४) २९—देवों ने आदित्यों से कहा, "तुम्हारे द्वारा इस (तीसरे) सवन को उठावें।" उन्होंने स्वीकार कर लिया। इसलिये तीसरे सवन के आरंभ में आदित्य ग्रह होता है। इसका याज्य मंत्र यह है:—