ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] १९३ आदित्यासो अदितिर्मादयन्तां मित्रो अर्यमा वरुणो रजिष्ठाः । अस्माकं सन्तु भुवनस्य गोपाः पिबन्तु सोममवसे नो अद्य ॥ ( ऋ० ७।५१।२ ) इसमें 'मद्' शब्द है, इससे मंत्र की समृद्धता है । तृतीय सवन का रूप ही मद्वाला होता है । न अनुवषट्कार किया जाता है, न सोम का पान होता है । क्योंकि अनुवषट्कार समाप्ति का सूचक है और सोमपान भी । प्राण आदित्य हैं । इससे वह यजमान के प्राणों का अन्त नहीं करना चाहता । आदित्यों ने सविता से कहा कि तेरी सहायता से हम इस तीसरे सवन को ऊपर उठावें । वह राजी हो गया । इसलिये तीसरे सवन के वैश्वदेव शस्त्र का प्रतिपद् सविता का तृच है । सवितृ ग्रह वैश्वदेवशस्त्र का है । इसका याज्य मंत्र है :— ॐ दमूना देवः सविता वरेण्यो दधद् रत्ना दक्षं पितृभ्य आयुनि । पिबात्सोमं ममदन्नेन मिष्ट्यः परिज्माचिद् रमते अस्य धर्मणि ॥ ( आश्व० श्रौत सूत्र ५।१८ ) 'मद्' शब्द से इस मंत्र की रूपसमृद्धता है । तीसरे सवन की विशेषता मद्वाला होना है । न अनुवषट्कार कहता है न सोमपान करता है । क्योंकि अनुवषट्कार समाप्ति का सूचक है और सोमपान भी । प्राण सविता है । उसे ऐसा नहीं करना चाहिये कि कहीं यजमान के जीवन को समाप्त कर दे । सविता अधिकतर प्रातः और सायं सवन से पीता है । तृतीय सवन में सावित्री निविद् में 'पिब' शब्द आया है । और अन्त ॐ अथर्ववेद में पाठ भेद है :— दमूना देवः सविता वरेण्यो दधद् रत्नं दक्षं पितृभ्य आयूंषि । पिबात् सोमं ममददेनमिष्टये परिज्माचिद् क्रमते अस्य धर्मणि ॥ ( अथर्व० ७।१४।४ ) १३