भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

तीसरा अध्याय ] १९५ (१) सुरूप कृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे । जुहूमसि द्यवि द्यवि ॥ ( ऋ० १।४।१ ) (२) अयँ वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । इममपां सङ्गमे सूर्य्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति ॥ ( ऋ० १०।१२३।१ ) इस प्रकार प्रजापति ने दोनों ओर खड़े होकर पिया । इसलिये श्रेष्ठी जिसको चाहता है पिला सकता है । देवों ने उन ऋभुओं से घृणा की क्योंकि उनमें मनुष्य की गंध आती थी । उन्होंने अपने और ऋभुओं के बीच में दो धाय्य और रख लीं :— (१) येभ्यो माता मधुमत् पिन्वते पयः पीयूषं द्यौरदितिरद्रिबर्हाः । उक्थ शुष्मान् वृषभराम् त्सवप्न सस्तॉँ आदित्याँ अनुमदा स्वस्तये ॥ ( ऋ० १०।६३।३ ) (२) एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः । बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ (ऋ० ४।५०।६) (६) ३१—अब वह वैश्वदेव सूक्त को पढ़ता है ( ऋ० ५।८९ ) वैश्वदेव शस्त्र प्रजा का संबन्ध बताने के लिये है । जैसे राज्य के अन्तर्गत जनता होती है उसी प्रकार शस्त्र के सूक्त हैं । धाय्य अरण्य पशुओं के समान हैं । इसलिये हर धाय्य के पहले और पीछे 'शोंसावोम्' कहना चाहिये । इस पर कुछ लोग कहते हैं कि धाय्य में जीवन है, वह अरण्य के समान कैसे हुई ? ऋषि ऐतरेय उत्तर देते हैं कि यह अरण्य भी अनरण्य के समान है क्योंकि अरण्य में हिरन और पक्षी पाये जाते हैं । वैश्वदेव शस्त्र पुरुष के समान है । इसके सूक्त उनके अंग हैं । जो धाय्य हैं वे पर्व या जोड़ हैं । इसीलिये होता हर धाय्य के पहले और पीछे 'शोंसावोम्' कहता है । क्योंकि पुरुष के जोड़ शिथिल होते हैं । ब्रह्म उनको दृढ़ करता है ।