भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 592 में से

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१९६ [ तीसरी पञ्चिका ये जो धाय्य और याज्य हैं वह यज्ञ की मूल हैं। अगर अन्य धाय्य और अन्य याज्य पढ़े जायं तो यज्ञ निर्मूल हो जाय । इसलिये वे समान होनी चाहिये । यह जो वैश्वदेव शस्त्र है वह पांचजन्य है । अर्थात् यह पाँचों का है, देव, मनुष्य, गंधर्व, अप्सरा, सर्पों तथा पितरों का । वैश्वदेव शस्त्र इन पाँचों में से सब का है । इन पाँचों में से सभी (वैश्वदेव शस्त्र के होता को ) जानते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसके पास इन पाँचों में से सभी हवी लोग (हवन करने में कुशल ) आते हैं । जो होता वैश्वदेव शस्त्र को पढ़ता है वह सब देवताओं का होता है । जब वह शस्त्र को पढ़ने लगे तो उसे सब दिशाओं का चिन्तन कर लेना चाहिये । इस प्रकार वह सब दिशाओं को रस युक्त कर देता है । परन्तु जिस दिशा में उसका शत्रु हो उसका चिन्तन न करें । ऐसा करने से वह उसे निर्बल देता है । इस मंत्र से समाप्त करता है :- अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥ ( ऋ० १।८६।१० ) “अदिति द्यौ है, अंदिति अन्तरिक्ष है । अदिति माता है, वह पिता है । वह पुत्र है । यह मां है, बाप है, बेटा है। अदिति विश्वेदेव है । अदिति पांचजन्य है । इसी में विश्वेदेव है । इसी में पंचजन हैं। पैदा हुई वस्तु अदिति है । पैदा होनेवाली भी अदिति है ।” वह अन्तिम मंत्र को दो बार पढ़ता है, पादों पर ठहर-ठहर कर । पशुओं की प्राप्ति के लिये । क्योंकि पशु चार पैर के होते हैं । पहली बार वह आधे मंत्र पर ठहरता है, प्रतिष्ठा के लिये । मनुष्य के दो पैर होते हैं और पशु के चार । दो बार फिर दुहराने से मानों, दुपाये को चौपायों में स्थान देता है ।

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