ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] १९७ वैश्वदेव शस्त्र की समाप्ति पर पांचजन्य मंत्र (१।८९।१० के समान ) बोलना चाहिये और फिर भूमि का स्पर्श करना चाहिये । इस प्रकार वह जहाँ यज्ञ को रखना चाहता है वहाँ उसकी स्थापना कर देता है । वैश्वदेव-उक्थ को पढ़ने के उपरान्त वैश्वदेव याज्य मंत्र पढ़ता है । विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षं य उप द्यविष्ठ । ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम् ॥ ( ऋ० ६।५२।१३) इस प्रकार वह देवों को उनके भाग के अनुसार प्रसन्न करता है । (७) ३२—पहला घृत का याज्य मंत्र अग्नि का है । दूसरा सोम का ( चरु का ) याज्य सोम का । एक घृत का याज्य विष्णु का है । सोम का याज्य यह है :— त्वं सोम पितृभिः संविदानोऽनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ । तस्मै त इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ ( ऋ० ८।४८।१३) इस में पितर शब्द पड़ा है । जब सोम को निचोड़ते हैं तो इसका अर्थ यह है कि उसका हनन करते हैं । यह चरु ( भात का पिण्ड ) अनुस्तरणी ( वह गौ जो मृत यजमान को चिता पर रखने के बाद दी जाती है ) है । यह चरु सोम के लिये वही अर्थ रखता है जो अनुस्तरणी पितरों के लिये । इसी लिये होता 'पितर' शब्दों वाला याज्य मंत्र पढ़ता है । जिन्होंने सोम निचोड़ा उन्होंने उसका हनन कर दिया । अब वह उसको पुन- र्जीवित करते हैं, अब उस सोम को बढ़ाते हैं ( आप्यायन्ति ) उपसदों के रूप में । यह जो अग्नि, सोम और विष्णु देवता हैं वे उपसद् रूप हैं ।