भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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तीसरा अध्याय ] २०१ बोलने में भूल न हो जाय इससे उसको चाहिये कि किसी दूसरे आदमी को शोधने के लिये नियत कर दे । मानो वह इस संशोधक को पुल के तौर पर मान कर अग्नि को पार करता है। इसमें कोई भूल होनी न चाहिये इसलिए जब होता मंत्र बोले तो कोई उसकी अशुद्धि को शुद्ध करने वाला होना चाहिये । जो वीर्य बहा वह मरुत है। उसको हिला कर इन्होंने बहाया । इसलिये वह मरुतों का सूक्त पढ़ता है । बीच में योनि (स्तोत्रिय) और अनुरूप प्रगाथ का पाठ करे । यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियं धियं वो देवया उ दधिध्वे । आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः ॥ वत्रासो न ये स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः । सहस्रि- यासो अपां नोर्मय आस्रा गावो वन्धासो नोक्षणः ॥ ( ऋ० १।१६८।१-२ ) यह योनि हुई । देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद् वा सिञ्चध्वमुप पृणध्वमादिद्धो देव ओहते ॥ तं होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत । दधाति रत्नं विधते सुवीर्यंमग्निर्जनाय दाशुषे ॥ ( ऋ० ७।१६।११-१२ ) यह अनुरूप हुआ । बीच में योनि कहने का कारण यह है कि स्त्रियों की योनि बीच में होती है । (वैश्वानरीय और अग्नि-मारुतीय) दो सूक्तों को पढ़ने के बाद योनि इसलिये पढ़ी जाती है कि उसमें पुरुष इन्द्रिय को स्थापित करता है, जिससे प्रजा उत्पन्न हो । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं वाला होता है । (११) ३६—जातवेद के सूक्त को पढ़ता है। जब प्रजापति ने