ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri २०२ [ तीसरी पञ्चिका सृष्टि बनाई तो वे सब मुँह फेर कर चले गये और पीछे न लौटे। तब उसने इनको चारों ओर आग से घेर दिया। तब उन्होंने अग्नि की ओर मुख किया। जब उन्होंने अग्नि की ओर मुख किया तो प्रजापति ने कहा, "इन उत्पन्न हुये (जात) को मैंने इस अग्नि के द्वारा पाया (अविदम्) ।" इससे जात- वेद सूक्त हुआ। इसीलिये अंगिन को जातवेद कहते हैं। अग्नि से घिरे हुये प्राणी चल न सकते थे। वे अंगारों के बीच में खड़े थे। प्रजापति ने उन पर जल छिड़का। इसलिये जातवेद सूक्त को पढ़ने के बाद जल के सूक्त को पढ़ता है। “आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता” इति (ऋ० १०।६) यह इसलिये पढ़ना चाहिये मानो अग्नि को शान्त कर रहा है। प्रजापति ने जल छिड़कने के बाद कहा कि यह प्राणी मेरे निज के हैं। उसने उनमें अहिर्बुध्न्य द्वारा परोक्ष तेज धारण करा दिया। यह अहिर्बुध्न्य गार्हपत्य अग्नि है। अहिर्बुध्न्य का मंत्र पढ़कर वह परोक्ष तेज धारण कराता है। इसीलिये कहते हैं कि जो आहुति देता है वह आहुति न देने वाले से अधिक तेज वाला है। (१२) ३७—गृहपति अग्नि के लिये ( अहिर्बुध्न्य मंत्र पढ़ कर ) देव पत्नियों के लिये मंत्र पढ़ता है। क्योंकि यजमान की पत्नी गार्हपत्य अग्नि के पीछे बैठती है। कुछ लोग कहते हैं कि पहले राका का मंत्र पढ़ना चाहिये क्योंकि सोमपान का पहला अधिकार बहिन का है। परन्तु यह नहीं चाहिये। पहले देवपत्नियों के लिये मंत्र पढ़ना चाहिये। ऐसा करने से गार्हपत्य अग्नि पत्नियों में वीर्य्य धारण कराता है। गार्हपत्य अग्नि के द्वारा होता ने पत्नियों को उत्पत्ति के अर्थ वीर्य से प्रत्यक्षरूप से सम्पन्न कर दिया । जो इस रहस्य को समझता है वह पशुओं और सन्तान से युक्त होता है। बहिन CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.