ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] २०९ इष्टि में भी। चातुर्मास्य इष्टि आतिथ्य इष्टि के अन्तर्गत होकरं अग्निष्टोम में मिल गई । प्रवर्ग्य में दूध की आहुति देते हैं। दाक्षायन में भी। इस प्रकार दाक्षायन भी अग्निष्टोम में शामिल है । उपवसथ अर्थात् सोमयाग से एक दिन पूर्व पशु-बंधन होता है। इस प्रकार जो-जो पशुबंध हैं वे सब अग्निष्टोम में आजाते हैं । इलादध एक ऋतु होता है। उसे दही से करते हैं । (अग्निष्टोम के) दधिघर्म कृत्य में भी दही का ही प्रयोग होता है। इसलिये इलादधि भी अग्निष्टोम में शामिल है। (२) ४१—पहला भाग तो कह दिया गया। अब पिछला भाग लीजिये। इस कृत्य के बाद उक्थ्य के १५ स्तोत्र और १५ शस्त्र आते हैं। अगर वह साथ-साथ लिये जांय, तो महीनों के रूप में संवत्सर हो जाते हैं। (महीने में ३० दिन हुये) । अग्नि वैश्वानर संवत्सर है। अग्निष्टोम अग्नि है। संवत्सर के अनुगामी होने से उक्थ्य अग्निष्टोम में शामिल है। उक्थ्य के शामिल होते ही वाजपेय भी शामिल हो जाता है। क्योंकि उक्थ्य से यह (केवल दो स्तोत्र ही) अधिक है । अतिरात्र के बारह सोम के प्याले पंद्रह मंत्रों से सम्बद्ध हैं। दो-दो करके तीस हो जाते हैं। षोडशी साम में २१ भाग हैं। संधि में ९। इस प्रकार तीस हो गये । साल भर तक हर मास में ३० रातें होती हैं । अग्नि वैश्वानर संवत्सर है और अग्नि ही अग्निष्टोम है । अतिरात्र संवत्सर में शामिल हैं इसलिये अग्निष्टोम में शामिल हैं। जिस प्रकार अतिरात्र अग्निष्टोम में शामिल है उसी तरह अप्तोर्यामा भी। क्योंकि अप्तोर्यामा भी अतिरात्र ही हो जाता है। १४