ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१० [ तीसरी पञ्चिका इस प्रकार अग्निष्टोम के पहले और बाद को जितने कृत्य हैं वे सब अग्निष्टोम में शामिल हैं ॥ अग्निष्टोम के सब स्तोत्र १९० होते हैं । ९० बराबर हैं दश त्रिवृत के (९x१०) १० में ९ से एक अधिक है । शेष ९ यानी त्रिवृत हैं । २१ बार ९ लेकर १८९ हुये । एक हुआ सूर्य्य जो तपता है । यह विषुवत् है । दश त्रिवृत्त स्तोम इसके पहले हैं और दश पीछे । एक बीच में है जो इन के ऊपर घूमता और तपता है अर्थात् सूर्य्य । एक स्तोत्रिय जो अधिक है । इसके ऊपर ढकने के समान है । यह यजमान है । यह दिव्य छत्र है । जो किसी आक्रमण का निवारण कर सकता है । जो इस रहस्य को समझता है उसे दिव्य छत्र की प्राप्ति होती है । वह किसी आक्रमण का सहन कर सकता है । और उसको सायुज्य, सारूप्य और सालोक्य प्राप्त हो जाता है । (३) ४२—एक बार देवते असुरों से हार गये और ऊपर की ओर स्वर्ग लोक चले । अग्नि ने नीचे भूमि से स्वर्ग के ऊपर के हिस्से को छुआ और वहाँ पहुँचकर स्वर्ग लोक का द्वार बन्द कर दिया । अग्नि स्वर्ग लोग का अधिपति है । पहले वसु लोग उसके पास गये और कहा, “अपनी लपटों में होकर हमको आकाश अर्थात् स्थान दे कि हम ऊपर चले जा सकें”। उसने कहा, “बिना स्तुति किये मैं तुमको जाने न दूंगा । तुम मेरी स्तुति करो”। वह मान गये और नौ ऋचाओं (त्रिवृत स्तोम) से उसकी स्तुति की । जब उन्होंने ऐसा किया तो उसने उनको स्वर्ग में जाने दिया । अब रुद्र लोग आये और कहा कि अपनी लपटों में होकर हमको जगह दे कि हम स्वर्ग को जासकें । उसने कहा कि बिना स्तुति के मैं जाने न दूंगा । तुम मेरी स्तुति करो । वे मान गये