ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] २११ और १५ ऋचाओं से स्तुति की । उसने उनको जाने दिया और वह यथेष्ट लोक को पहुँच गये । अब आदित्य लोग पहुँचे और कहा कि अपनी लपटों में होकर हमको जगह दे कि हम स्वर्ग को जा सकें। उसने कहा कि बिना स्तुति कराये मैं जाने न दूंगा । तुम मेरी स्तुति करो । उन्होंने मान लिया और १७ ऋचाओं से स्तुति की । तब उसने उनको जाने दिया और वे यथेष्ट लोक में पहुँच गये । अब विश्वेदेव आये और कहा कि अपनी लपटों में होकर हमको जगह दे कि हम स्वर्ग को जा सकें । उसने कहा कि मैं बिना स्तुति कराये तुमको जाने न दूंगा; तुम मेरी स्तुति करो । उन्होंने स्वीकार कर लिया और २१ स्तोमों से स्तुति की। और स्तुति करने के पश्चात् वह यथेष्ट लोक में पहुँच गये । इस प्रकार एक एक करके देवते गये और एक एक स्तोम से स्तुति कर करके यथेष्ट लोक को प्राप्त हो गये । जो यजमान चार स्तोमों से स्तुति करता है और जो ऋत्विज ( अग्निष्टोम को ) जानता है वह अग्नि को पार करके चला जाता है । जो इस रहस्य को समझता है अग्नि उसको जगह दे देता है और वह स्वर्ग लोक को प्राप्त हो सकता है । (४) ४३—अग्निष्टोम अग्नि ही है । देवों ने अग्नि की स्तोम से स्तुति की इसलिये अग्निष्टोम नाम पड़ा । अग्नि + स्तोम का परोक्ष रूप अग्निष्टोम हो गया । क्योंकि देव परोक्ष-प्रिय होते हैं । चार प्रकार के देवों ने चार स्तोमों से स्तुति की । इसलिये इसको "चतुःष्टोम' कहते हैं । यह परोक्ष रूप हैं। देव परोक्ष- प्रिय होते हैं । अग्नि की उस समय स्तुति की गई जब वह ऊपर को ज्योति के रूप में जा रहा था । इसलिये इसको "ज्योतिःस्तोम”