ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] २१३ सायंकाल के सवनों को करने में जल्दी नहीं करनी चाहिये। तो यजमान शीघ्र न मरेगा। शस्त्रों के पढ़ने में सूर्य की चाल का अनुकरण करे। प्रातः- काल के समय यह शनैः-शनैः तपता है। इसलिये प्रातःकाल के समय शस्त्रों को धीरे धीरे पढ़े। दोपहर को तेज़ होता है इस- लिये दोपहर के सवन में तेज़ पढ़ना चाहिये। दोपहर के बाद मुँह के सामने बहुत तेज़ तपता है। इसलिये सायंकाल के सवन में बहुत तेज़ी से पढ़ना चाहिये। उस समय ऐसी तरह पढ़ना चाहिये मानो वाणी पर पूरा प्रभुत्व है। क्योंकि वाणी ही शस्त्र है। तृतीय सवन में जिस तेज़ी से आरंभ किया था अगर उसी तेज़ी से बराबर पढ़ता जाय तो बहुत ही अच्छा होता है। सूर्य न कभी अस्त होता है, न उदय होता है। जो इसको अस्त होता हुआ जानता है वह केवल दिन का अन्त करके फिर अपने को लौटा देता है। रात्रि इधर कर देता है और दिन उधर। और जो यह प्रातःकाल को उदय होता हुआ मानते हैं यह रात का अन्त करके अपने को लौटा देता है। दिन इधर करता है और रात उधर। सूर्य कभी अस्त नहीं होता। जो इस रहस्य को समझता है उस को सूर्य से सायुज्यता, सारूप्यता और सालोक्यता प्राप्त होती है। उसका कभी अस्त नहीं होता। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ।