भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

पांचवाँ अध्याय ] २१५ देवों ने उपसदों के कृत्य द्वारा यज्ञ की समीपता प्राप्त की । उन्होंने इसको जल्दी जल्दी किया और केवल तीन सामिधेनियों और देवतों के याज्य पढ़कर उसको समाप्त कर दिया । इसीलिये उपसदों में केवल तीन सामिधेनियां और तीन देवतों के याज्य पढ़े जाते हैं । क्योंकि मनुष्यों ने भी देवों का अनुकरण किया । देवों ने उपवसथ किया । उपवसथ के दिन ही उन्होंने यज्ञ को प्राप्त किया । यज्ञ को करने के बाद उन्होंने सभी कृत्यों को पत्नी समयाज सहित किया । इसीलिये सोम याग के एक दिन पहले मनुष्य भी उपवसथ करते हैं और पत्नी समयाज सहित सभी कृत्य करते हैं । इसलिये उपवसथ पूर्व के सभी कृत्यों में मंत्रों को बहुत धीरे धीरे पढ़ना चाहिये । क्योंकि देवों ने यज्ञ को पा लेने के पहले सब कृत्यों का इस प्रकार किया मानों वह उसे ढूंढ रहे हैं । इसलिये उपवसथ के दिन मंत्रों को जैसे चाहे पढ़े क्योंकि उस दिन तो यज्ञ मिल चुका था । यज्ञ को प्राप्त करके देवों ने उससे कहा, “ठहर हमारे भोजन के लिये ।” उसने कहा, “नहीं । मैं तुम्हारे लिये क्यों ठहरूं ?” उसने उनकी ओर देखा । उन्होंने कहा, “ब्राह्मण और छन्दों से संयुक्त होकर तू भोजन के लिये ठहर ।” वह मान गया ! इसलिये यज्ञ ब्राह्मण और छन्दों से युक्त होकर हवि को देवों तक ले जाता है । (१) ४६—यज्ञ में तीन दोष हो जाया करते हैं । पहला 'जग्ध' (उगला हुआ खा लेना) । दूसरा गीर्ण (निगल जाना) । तीसरा वातं (कै या वमन करना) । अगर कोई ऋत्विज् यह सोचकर अपने को स्वयं ही अर्पण करे कि यजमान मुझे कुछ देगा या यजमान मुझसे यह कृत्य करायेगा । तो ऐसे पुरुष को नियुक्त करना उगले हुये को खाने