ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१८ [ तीसरी पञ्चिका इन (देविका) आहुतियों के विषय में कुछ लोग कहते हैं कि इन सब देविकों की आहुतियों के पहले पहले एक एक ही की आहुति धाता को देवे। ऐसा करने से वह हर देविका का धाता से मैथुन करा देगा। इस पर कहते हैं कि ऐसा करना आलस्य (अनुचित) है कि एक ही दिन में ऋचाओं के एक ही जोड़े (पुरानुवाक्य और याज्य) पढ़े जायँ। कई स्त्रियाँ भी तो एक ही पति से मैथुन करती हैं। जब (चारो) देविकाओं से पहले होता धाता के लिये याज्य मंत्र पढ़ता है तो मानों धाता सभी देविकाओं के साथ मैथुन कर लेता है। देविकाओं की आहुति के विषय में इतना कथन हुआ। (३) ४८-अब देवियों की आहुतियों के विषय में। 'सूर्य' के लिये एक कपाल का पुरोडाश रक्खे। जो सूर्य है वह धाता है। और वही वषट्कार है। 'द्यौ' के लिये चरु। द्यौ अनुमति है। वह गायत्री है। 'उषा' के लिये चरु। उषा राका है। वह त्रिष्टुभ् है। 'गौ' के लिये चरु। गौ सिनीवाली है। गौ जगती है। 'पृथिवी' के लिये चरु। पृथिवी कुहू है। पृथिवी अनुष्टुभ् है। यज्ञ में जो अन्य छन्द प्रयोग किये जाते हैं वह सब गायत्री, त्रिष्टुभ्, जगती और अनुष्टुभ् का अनुसरण करते हैं। जो इस रहस्य को समझकर इन छन्दों के लिये आहुतियाँ देता है वह सभी छन्दों को आहुतियाँ देता है। कहावत है कि अच्छा घोड़ा सवार को सुख देता है। यही छन्दों का हाल है। क्योंकि वे यजमान को सुख देते हैं जो इस रहस्य को समझता है वह उस लोक को प्राप्त होता है जिसको ओर उसका ध्यान भी न रहा हो। इन (देवियों) की आहुतियों के विषय में कुछ लोगों का कहना है कि हर देवी को आहुति