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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

२१८ [ तीसरी पञ्चिका इन (देविका) आहुतियों के विषय में कुछ लोग कहते हैं कि इन सब देविकों की आहुतियों के पहले पहले एक एक ही की आहुति धाता को देवे। ऐसा करने से वह हर देविका का धाता से मैथुन करा देगा। इस पर कहते हैं कि ऐसा करना आलस्य (अनुचित) है कि एक ही दिन में ऋचाओं के एक ही जोड़े (पुरानुवाक्य और याज्य) पढ़े जायँ। कई स्त्रियाँ भी तो एक ही पति से मैथुन करती हैं। जब (चारो) देविकाओं से पहले होता धाता के लिये याज्य मंत्र पढ़ता है तो मानों धाता सभी देविकाओं के साथ मैथुन कर लेता है। देविकाओं की आहुति के विषय में इतना कथन हुआ। (३) ४८-अब देवियों की आहुतियों के विषय में। 'सूर्य' के लिये एक कपाल का पुरोडाश रक्खे। जो सूर्य है वह धाता है। और वही वषट्कार है। 'द्यौ' के लिये चरु। द्यौ अनुमति है। वह गायत्री है। 'उषा' के लिये चरु। उषा राका है। वह त्रिष्टुभ् है। 'गौ' के लिये चरु। गौ सिनीवाली है। गौ जगती है। 'पृथिवी' के लिये चरु। पृथिवी कुहू है। पृथिवी अनुष्टुभ् है। यज्ञ में जो अन्य छन्द प्रयोग किये जाते हैं वह सब गायत्री, त्रिष्टुभ्, जगती और अनुष्टुभ् का अनुसरण करते हैं। जो इस रहस्य को समझकर इन छन्दों के लिये आहुतियाँ देता है वह सभी छन्दों को आहुतियाँ देता है। कहावत है कि अच्छा घोड़ा सवार को सुख देता है। यही छन्दों का हाल है। क्योंकि वे यजमान को सुख देते हैं जो इस रहस्य को समझता है वह उस लोक को प्राप्त होता है जिसको ओर उसका ध्यान भी न रहा हो। इन (देवियों) की आहुतियों के विषय में कुछ लोगों का कहना है कि हर देवी को आहुति

पाँचवाँ अध्याय ] २१९ देने से पहले सूर्य को घी की आहुति देवे क्योंकि इससे वह सूर्य का अन्य देवियों के साथ मैथुन कराता है । इस पर कहते हैं कि एक दिन में ऋचाओं के एक ही जोड़े को बार बार कहना अनुचित है। कई पत्नियाँ भी एक पति से मैथुन करती हैं । इन चारों देवियों के लिये आहुतियाँ देने से पूर्व जो सूर्य के लिये एक आहुति दी जाती है उससे मानों सूर्य हर देवी के साथ मैथुन कर लेता है । जो यह हैं वह वह हैं । जो वह हैं वह ये हैं (अर्थात् धाता और अनुमति वही हैं जो सूर्य और द्यौ इसलिये जो कामनायें सिद्ध हो सकती हैं वे एक से भी सिद्ध हो जाती हैं) । जिसको सन्तान की इच्छा हो उसके लिये दोनों प्रकार की देवी और देविकाओं के लिये पुरोडाश का एक एक भाग काटकर रक्खे जिससे दोनों प्रकार के देवतों की संतुष्टि हो जाय । परन्तु जो धन की कामना करे उसके लिये ऐसा न करे । यदि वह धन की कामना करने वाले के लिये दोनों प्रकार की देवी देविकों के लिये पुरोडाश देगा तो देव लोग यजमान के धन का दाह करके उससे अप्रसन्न हो जायंगे । ऐसे पुरुष को तो यही समझ लेना चाहिये कि इतना पर्याप्त है । एक बार शुचिवृक्ष गोपालायन ने वृद्धद्युम्न प्रतारिण के यज्ञ में देविका और देवियों दोनों के लिये पुरोडाश दे दिया । उसने राजा के एक पुत्र को जल में तैरते देखकर कहा "यह इसीलिये हैं कि मैंने देवी और देविका दोनों को राजा के यज्ञ में प्रसन्न कर दिया था । इसीलिये राजकुमार जल में तैरता है । इसके सिवाय राजा के चौंसठ पुत्र और पौत्र थे जो हर वक्त कवच पहने रहते थे । (४) ४९—अग्निष्टोम में देवों ने और उक्थ्यों में असुरों ने आश्रय लिया । दोनों बराबर शक्ति वाले थे इसलिये देव असुरों को न

२२० [ तीसरी पञ्चिका निकाल सके। ऋषियों में से भरद्वाज ने उनको देखा और कहा यह असुर उक्थ्यों में छिपे हैं। इसलिये कोई और उनको देख नहीं सकता।" उसने इस मंत्र से अग्नि को बुलाया :— एह्य॒ षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्येतरागिरः। एभिर्व॑र्धास इन्दुभिः। (ऋ० ६।१६।१६) "इतरा गिरः" (अर्थात् दूसरी वाणियाँ) असुरों की हैं। इस पर अग्नि उठा और कहने लगा "यह कृश (दुबला), दीर्घ (लम्बा), पलित (पीला) पुरुष क्या कहता है? क्योंकि भरद्वाज दुबला, लम्बा और पीला था। उसने कहा "यह असुर उक्थ्यों में प्रविष्ट हो गये। इन को कोई नहीं देख सकता।" अग्नि घोड़ा बनकर उनके पीछे दौड़ा, और उसने उनको पकड़ लिया। इससे साकमश्वंसाम" बन गया। तभी से यह "साकम- श्वंसाम" कहलाता है। इस पर लोग कहते हैं कि 'साकमश्वंसाम' से उक्थ्यों को शुरू करे। और जो उक्थ्य साकमश्वं से नहीं शुरू होते हैं उनको शुरू होते न समझना चाहिये। इस पर कुछ लोगों का कहना है कि प्रमंहिष्टीय से उक्थ्यों को शुरू करना चाहिये क्योंकि इन्हीं के द्वारा देवों ने असुरों को उक्थ्यों से निकाला था। ऋषि का कथन है कि चाहे प्रमंहिष्टीय से शुरू करे या साकमश्वंसाम से। जैसा जी चाहे। (५) ५०—असुर मित्रावरुण के उक्थ्य में घुस गये। इन्द्र ने कहा, "कौन मेरा साथ देगा कि हम दोनों इन असुरों को वहाँ से निकाल दें।" वरुण ने कहा, "मैं"। इसलिये तृतीय सवन में इन्द्र-वरुण के लिये मित्रावरुण का उक्थ्य पढ़ा जाता है। असुर यहाँ से निकल कर ब्राह्मणाच्छंसी में घुस गया। इन्द्र ने कहा, "मैं"। इसलिये तीसरे सवन में इन्द्र-बृहस्पति के

पाँचवाँ अध्याय ] २२१ लिये ब्राह्मणाच्छंसी उक्थ्य पढ़ा जाता है। इन्द्र और बृहस्पति ने असुरों को उसमें से निकाल दिया। असुर यहाँ से निकल कर अच्छावाक् में घुस गये। इन्द्र ने कहा, "कौन मेरा साथ देगा कि हम दोनों असुरों को यहाँ से निकाल दें।" विष्णु ने कहा, "मैं"। इसलिये तीसरे सवन में इन्द्र और विष्णु के लिये अच्छावाक् उक्थ्य पढ़ा जाता है। इन्द्र और विष्णु ने उनको वहाँ से निकाला। इन्द्र के साथ जिन देवों की स्तुति की जाती है वे द्वन्द्व अर्थात् जोड़े हैं। जोड़े में नर और नारी होते हैं। इसी जोड़े से जोड़ा उत्पन्न होता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं से युक्त होता है। पोत्रीय और नेष्ट्रीय ऋतुयाज चार होते हैं। वे छः ऋचायें होती हैं। यह विराट् है जिसमें दस भाग हैं। इस प्रकार यह यज्ञ को दस भाग वाले विराट् से समाप्त करते हैं। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका समाप्त हुई।

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चौथी पञ्चिका

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पहला अध्याय १-देवों ने पहले दिन ( की सोम-इष्टि ) द्वारा इन्द्र के लिये वज्र तैयार किया । दूसरे दिन के द्वारा ठंडा किया । तीसरे दिन के द्वारा इन्द्र को अर्पण किया और चौथे दिन के द्वारा उसने उससे शत्रुओं पर प्रहार किया । इसलिये होता चौथे दिन षोडशी शस्त्र को पढ़ता है । यह जो षोडशी है वह वज्र है । यह जो चौथे दिन षोडशी का पाठ करता है मानो वज्र का प्रहार करता है अपने शत्रु और अहित- चिन्तक पर और उस पर जिस का मारना ठीक हो । षोड़शी वज्र हैं । उक्थ्य पशु हैं । उस ( षोडशी ) को शस्त्रों के ढकने के तौर पर पढ़ता है । ऐसा करने से मानो षोडशी के शस्त्र से पशुओं को घेर लेता है । इसलिये षोडशी रूपी वज्र से जब पशु घेरे जाते हैं तो वे यजमान के पास लौट आते हैं । इसलिये घोड़ा हो या पुरुष हो या गौ हो या हाथी हो यदि ये जाते हों तो स्वयं ही लौट आते हैं यदि इनको पुकारा जाय । षोडशी रूपी वज्र को देखकर इस षोडशी वज्र से ही वश में आते हैं। क्योंकि वाणी वज्र है। षोडशी वज्र है। ( २२५ ) १५

२२६ [ चौथी पञ्चिका प्रश्न होता है कि यह षोडशी नाम क्यों पड़ा । स्तोत्र १६ होते हैं । शस्त्र भी सोलह होते हैं । सोलह अक्षर ( अनुष्टु॒भ् ) के बाद ठहरता है और सोलह अक्षर के बाद 'ओ३म्' कहता है । इसमें १६ पदों का निविद् रक्खा जाता है । इसीलिये षोडशी नाम पड़ा । अब दो अक्षर बढ़े ( मंत्र के पिछले भाग में १६ के बजाय अठारह अक्षर होते हैं । ) क्योंकि षोडशी के अनुष्टुभ् में अठा- रह अक्षर हैं । यह वाणी के दो स्तन रूप हैं जो इस रहस्य को समझता है उसकी सत्य रक्षा करता है और झूठ उसको हानि नहीं पहुँचाने पाता । (१) २--तेज और ब्रह्मवर्चस् का इच्छुक षोडशी में गौरिवीत साम का पाठ करे । ( गौरिवीत साम-इन्द्र जुषस्व प्रवहाय··· साम वेद, उत्तरार्चिक ३।२२; आश्वलायन श्रौत सूत्र ६।२ ) । यह गौरिवीत साम तेज भी है और ब्रह्मवर्चस् भी । जो इस रहस्य को समझ कर गौरिवीत साम पढ़ता है वह तेजस्वी और ब्रह्म- वर्चस्वी होता है । कुछ लोग कहते हैं कि षोडशी में नानद साम पढ़ना चाहिये, ( नानद साम—प्रत्यस्मै पिपीषते इत्यादि, सामवेद ४।२।७।१-४ ) इन्द्र ने वृत्र के लियें वज्र उठाया, और उसे मारा, और उसे घायल किया । घायल होकर वह शोर करने लगा ( व्यनदत् ) । इसलिये नानद साम हो गया । इसीलिये इसको नानद साम कहते हैं । नानद साम को शत्रु का भय नहीं क्योंकि यह शत्रु का मारने वाला है। जो इस रहस्य को समझ कर षोडशी में नानद साम का पाठ करता है उसका शत्रु मर जाता है और वह शत्रुओं से अभय हो जाता है । यदि नानद साम पढ़ा जाय तो अविहृत पढ़ना चाहिये (अर्थात् एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से नहीं मिलाने

पहला अध्याय ] २२७ चाहिये) क्योंकि इसको अविहृत ही पढ़ा जाता है। यदि षोडशी शस्त्र में 'गौरिवीत' का पाठ करे तो विहृत पढ़े (अर्थात् एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से मिला देना चाहिये) क्योंकि उसको इसी प्रकार पढ़ा करते हैं। ३—यदि गौरिवीत पढ़ा जाय तो होता छन्द कं पदों को मिला जुला देता है (व्यतिषजति)। गायत्री और पंक्ति को मिला देता है "आत्वा वहन्तु" (ऋ० १।१६।१-३) और उप- सुश्रूणिहि (१।८२।१,३,४)। (पहला गायत्री है और दूसरा पंक्ति)। पुरुष गायत्री होता है और पशु पंक्ति। इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं से मिलाता है और उनको पशुओं में स्थापित करता है। गायत्री और पंक्ति मिल कर दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार यजमान अनुष्टुभ् रूप वाणी से या वज्र से अलग नहीं होता। उष्णिग् और बृहती को मिला देता है जैसे "यदिन्द्र पृतनाज्ये" "अयन्तेते अस्तु हर्य्यत।" (ऋ० ४।२४।२५-२७ और ३।४४।१-३)। पुरुष उष्णिग् है और पशु बृहती। इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं से मिला देता है और पशुओं में उसकी स्थापना कर देता है। उष्णिग् और बृहती मिल कर दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार वह अनुष्टुभ् रूपी वाणी से और वज्र से अलग नहीं होता। वह द्विपद को त्रिष्टुभ् से मिला देता है। जैसे "धूर्ध्वस्मै" और "ब्रह्मन् वीर" (ऋ० ७।३४।४ तथा ७।२९।२) पुरुष द्विपद् है और वीर्य त्रिष्टुभ्। इस प्रकार पुरुष को वीर्य से मिला देता है; और वीर्यवान् कर देता है। यही कारण है कि मनुष्य वीर्य- वान् होकर सब पशुओं से अधिक बल वाला हो जाता है।

२२८ [ चौथी पञ्चिका बीस अक्षरों का द्विपद् और ४४ का त्रिष्टुभ् मिल कर ६४ अक्षर के दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार यजमान व अनुष्टुभ् रूपी वाणी से और वज्र से अलग नहीं होता। वह द्विपद् और जगती को मिला देता है जैसे एष ब्रह्मा (आश्व० श्रौतसूत्र ६।२) और प्रतेमहे (ऋ० १०।९६।१-३)। पुरुष द्विपद् हैं और पशु जगती हैं, इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं से मिला देता है और पशुओं में उसकी स्थापना कर देता है। इसलिये पुरुष पशुओं में प्रतिष्ठित होकर उनसे दुग्धादि भोजन प्राप्त करता है। और उन पर शासन करता है क्योंकि यह उसके वश में होते हैं। सोलह अक्षरों के द्विपद् और अड़तालीस अक्षरों की जगती मिलकर चौंसठ अक्षरों के दो अनुष्टुभ् हो जाते हैं। इस प्रकार यजमान वाणी रूपी अनुष्टुभ् और वज्र से अलग नहीं होता। वह अब नीचे के मंत्र बोलता है जिनमें उन नियत छन्दों से अधिक अक्षर हैं :—( अति छन्द ) ( १ ) त्रिकद्रुकेषु महिषोयवाशिरं ( ऋ० २।२२।१-३ ) ( २ ) प्रोष्वस्मै पुरोरथम् । ( ऋ० १०।१३३।१-३ ) छन्दों में से जो रस बहा वह अतिच्छन्दों में चला गया। इसीलिये इनको "अतिच्छन्द" कहते हैं। षोडशी शस्त्र सब छन्दों से बना है, इसलिये अतिच्छन्दों का पाठ किया जाता है। इस प्रकार होता यजमान को सब छन्दों से युक्त कर देता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब छन्दों के षोडशी द्वारा फूलता फलता है। (३)

पहला अध्याय ] २२९ · ४—महानाम्नी मंत्रों से कुछ टुकड़े लेकर उपसर्ग※ अर्थात् आधिक्य करता है :— पहली महानाम्नी यह ( भूलोक ) है, दूसरी अंतरिक्ष लोक, तीसरी वह ( स्वर्ग लोक )। इस प्रकार षोडशी में सब लोक आ गये । महानाम्नियों में से षोडशी में उपसर्ग करने का तात्पर्य यह है कि होता यजमान को सब लोकों में भाग देता है। जो इस रहस्य को समझता है वह षोडशी के सब लोकों से निर्मित होने के कारण फूलता फलता है। अब वह नीचे के प्रज्ञात अनुष्टुभों का पाठ करता है :— (१) प्र. प्रवनिष्टुभम्। (ऋ० ८।६६।१) (२) अर्चत प्रार्चत। (ऋ० ८।६६।८-१०) (३) यो न्यत्तौँफरांणायद् । (ऋ० ८।६६।१३-१५) प्रज्ञात अनुष्टुभों का पाठ ऐसा है जैसे कोई मार्ग से बहक गया हो और लौट-फेर कर ठीक मार्ग पर आ जाय । जो जो अपने को श्री वाला और संपन्न समझे उसको चाहिये कि होता से अविहृत पाठ कराये जिससे छन्दों को विहृत करने में जो उनकी क्षति होती है उस क्षति का उस पर भी प्रभाव न पड़ सके । अगर पाप नाश करने का प्रयोजन हो तो विहृत पाठ होना चाहिये।

※यह उपसर्ग पाँच हैं ( १ ) प्रेचन ( २ ) प्रचेतय ( ३ ) आया- हिपिबमत्स्व ( ४ ) क्रतुश्छन्द ऋते वृहत् ( ५ ) सुम्न आवेहि नो वसो। यह महानाम्नी मंत्रों से लिये गये हैं। यदि इनको अविहृत बोलना हो तो लगातार बोलते हैं। इन का एक अनुष्टुभ् हो जाता है ।. यदि विहृत बोलना हो तो अतिच्छन्दों में जोड़ देते हैं ।

२३० [चौथी पञ्चिका क्योंकि मनुष्य पाप से मिला है, षोडशी का विहृत पाठ करने से यजमान पाप से छूट जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह इस पाप से छूट जाता है। नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :— उद्यद् ब्रध्नस्य विष्टपम् । (ऋ० ८।६६।७) 'ब्रध्नस्य विष्टप' स्वर्ग है। इस प्रकार वह यजमान को स्वर्ग लोक में पहुँचाता है। वह नीचे के याज्य मंत्र को बोलता है :— अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते। ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषम् जठर आ वृषस्व ॥ (ऋ० १०।६६।१३) इस याज्य मंत्र को पढ़ने से षोडशी में सभी सवन सम्मिलित हो जाते हैं। "अपाः" (तूने पिया है) से प्रातः सवन का तात्पर्य है। इस प्रकार षोडशी में प्रातः सवन आ गया। "अथो इदं सवनं केवलं ते" (अब यह सवन केवल तेरा ही है) इससे दोपहर का सवन आ गया। इससे षोडशी में दोपहर का सवन सम्मिलित हो गया। "ममद्धि सोम" (सोम को पी या सोम से आनन्द उठा) इससे सायंकाल का सवन आ गया। इससे षोडशी में तीसरा सवन सम्मिलित आ गया। "वृषन्" (बलवान) षोडशी का रूप है। इस याज्य मंत्र को पढ़ने से षोडशी सब सवनों से बन जाती है। इस प्रकार यह सब सवनों की हो जाती है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब सवनों से बनी हुई षोडशी के द्वारा फूलता फलता है। याज्य मंत्र पढ़ने में हर ११ अक्षर के पद में महानाम्नियों में से पांच अक्षर का एक उपसर्ग* जोड़ देते हैं। इस प्रकार *यह उपसर्ग ये हैं:—(१) एवाह्ये व (२) एवहीन्द्र (३) एवाहि शक्रो (४) वशोहि शक्र ।

पहला अध्याय ] २३१ षोडशी को सब छन्दों से युक्त कर देता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब छन्दों से युक्त षोडशी द्वारा फूलता फलता है। (४) ५—दिन का देवों ने आश्रय लिया और रात का असुरों ने। वे दोनों बराबर शक्ति के थे और कोई किसी से न दबता था। इन्द्र ने कहा "मेरे साथ रात में कौन घुसेगा कि असुरों को यहाँ से निकाल दें।" लेकिन उसे देवों में कोई न मिला जो उसकी बात मानता। क्योंकि वे डरते थे कि रात का अंधकार मृत्यु है । यही कारण है कि आजकल भी लोग रात के समय निकट स्थान में जाते हुये भी डरा करते हैं। क्योंकि रात अंधेरी होती है और अंधेरी मृत्यु के समान है। छन्द उसके साथ चले। चूंकि छन्द रात के देवता हैं। न निविद् पढ़ा जाता है न पुरोरुक, न धाय्य। न इन्द्र और छंदों के सिवाय कोई देवता हैं। उन्होंने पर्यायों (सोम पात्र को बार बार देने को पर्याय कहते हैं) द्वारा घूम घूम कर असुरों को निकाला। चूंकि पर्यायों द्वारा उनको निकाला इस'लिये उनको पर्याय कहते हैं। पहले पर्याय में उन्होंने असुरों को रात के पहले भाग से निकाला। दूसरे पर्याय में बीच की रात से। और अन्त के पर्याय में पिछले पहर से। छंदों ने कहा, "केवल हमीं रात में (अपिशर्वर्या) तेरा साथ देते हैं।" इस लिए (ऋषि ऐतरेय ने) छंदों का 'अपि- शर्वराणि' नाम रख दिया। क्योंकि वे इन्द्र को जो मृत्यु रूपी यह हर पद में इस प्रकार जोड़े जाते हैं :- (१) एवाह्य वापाः पूर्वेषां हरिवः सुतानाम् । (२) एवहीन्द्रापो इदं सवनं केवलं ते । (३) एवाहि शक्रो ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र (४) वशो हि शक्र सत्रा वृषञ्जठर आ वृषस्व ॥

२३२ [ चौथी पञ्चिका रात के अंधकार से डरता था वहाँ से निकाल लाये। इसीलिये इनको अपिशर्वराणि कहते हैं। (५) ६—होता ( अतिरात्र के जापक ) नीचे के अनुष्टुभ् छन्द के मंत्र से आरंभ करता है:— पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्रगायत। विश्वासाहं शतक्रतुं मंहिष्ठं चर्षणीनाम्॥ (ऋ० ८।६२।१) इसमें 'अन्धस' (अंधेरा) शब्द पड़ा है। अनुष्टुभ् रात का है। रात्रि आनुष्टभी होती है। इन पर्यायों के याज्यों※ में 'अन्ध', (अंधेरा) 'पा' (पीना) और 'मद' (आनन्द करना) यह तीन शब्द अवश्य होते हैं। ※यह याज्य मंत्र यह हैं :— (१) अध्वर्यवो भरतेन्द्राय सोममामत्रेभिः सिञ्चता मद्यमन्धः। कामी हि वीरः सदमस्य पीतिं जुहोत वृष्णे तदिदेष वष्टि॥ (ऋ० २।१४।१) (२) अस्य मदे पुरु वर्षांसि विद्वांन्निन्द्रो वृत्रायप्रती चघान। तमु प्र ह षि मधुमन्तमस्मै सोमं वीराय शिप्रिणे पिबध्यै। (ऋ० ६।४४।१४) (३) अप्सु धूतस्य हरिवः पिबेह नृभिः सुतस्य जठरं पृणस्व। मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व मदमुक्थवाहः। (ऋ० १०।१०४।२) (४) इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायांऽवस्य हरी वि मुचा सखाया। उत प्र गाय गणा आ निषद्याऽथा यज्ञाय गृणते वयो धाः॥ (ऋ० ६।४०।१) (५) अपाय्यस्यान्धसो मदाय मनीषिणः सुवानस्य प्रयसः। यस्मिन्निन्द्रः प्रदिवि वावृधान ओको दधे ब्रह्मरण्यन्तश्चनरः। (ऋ० २।१६।१)

पहला अध्याय ] २३३ इससे याज्यों में रूप समृद्धता आ जाती है। जो रूप समृद्धता है वही यज्ञ में फलीभूत होती है। पहले पर्याय में पहले पद को बोलते हैं। इससे वे असुरों के जो घोड़े और गायें हैं उनको ले लेते हैं। बीच के पर्याय में बीच के पद को दो बार बोलते हैं। और ऐसा करके वह असुरों की गाड़ियों और रथों को छीन लेते हैं। अन्तिम पर्याय में अन्त के पद को दो बार बोलते हैं। ऐसा करके वे असुरों से उनके शरीरों पर जो वस्त्र, या सोना या रत्न होते हैं उनको छीन लेते हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने शत्रु को सब लोकों से निकाल देता है और उनसे सब कुछ छीन लेता है। यहाँ प्रश्न होता है कि पवमान स्तोत्र दिन के ही हैं, रात के नहीं, फिर इनका रात में क्यों पाठ होता है। दोनों के एक से ही भाग कैसे होते हैं ? इसका उत्तर यह है कि नीचे के मंत्रों से जो शस्त्र भी हैं और स्तोत्र भी :- इन्द्राय मद् बने सुतं परिष्टोभन्तु नो गिरः। अर्कमर्चन्तु कारवः ॥ (ऋ० ८।६२।१६) इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्। अनाभयिन् ररिमा ते ॥ (ऋ० ८।२।१) इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते। पिबा त्वस्य गिर्वणः ॥ (ऋ० ३।५१।१०) इस प्रकार रात भी पवमानवती हो जाती है। इस प्रकार दिन और रात दोनों पवमान युक्त हो जाते हैं। और उनके एक से भाग होते हैं। अब प्रश्न होता है कि जब १५ स्तोत्र दिन के लिये ही हैं

२३४ [ चौथी पञ्चिका रात के लिये नहीं तो दोनों के लिए १५ स्तोत्र कैसे हो गये ? और दोनों के समभाग कैसे हुये ? इसका उत्तर यह है 'अपिशर्वराणि' में १२ स्तोत्र होते हैं। इसके अतिरिक्त रथंतर स्वर में सन्धि स्तोत्र-पढ़ा जाता है जो तीन देवों के प्रति है। इस प्रकार रात के १५ स्तोत्र हो जाते हैं। इस प्रकार रात दिन के १५ स्तोत्र हो जाते हैं और वे सम- भाग भी हो जाते हैं। स्तोत्र परिमित हैं परन्तु पाठ (अनुशंसन) अपरिमित है। मानो भूतकाल परिमित है, भविष्य अपरिमित है। भविष्य के लिये ही अन्य मंत्र पढ़ता है। स्तोत्र से जो बढ़ा वह प्रजा है, जो अपने से बढ़ा वह पशु। इसमें अधिक मंत्रों के जाप से होता को उस सबकी प्राप्ति हो जाती है जो अपने से अधिक है (अर्थात् प्रजा, पशु, धन आदि)। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पंचिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ।

दूसरा अध्याय ७.-प्रजापति ने अपनी लड़की सूर्या सावित्री को सोम राजा को ब्याह दिया । सब देव मेहमान होकर आये । प्रजापति ने उनके लिये वहतु के रूप में ( मेहमानों को जो चीजें अर्पण की जाती हैं उनको 'वहतु' कहते हैं ) हज़ार मंत्रों का शस्त्र बनाया जिसे अश्विन-शस्त्र कहते हैं । जो एक हज़ार से कम रहे वह अश्विनों का नहीं है । इसलिये होता को चाहिये कि एक हज़ार मंत्र बोले या अधिक । घी को खाकर बोले । जैसे लोक में गाड़ी या रथ के पहियों में तेल लगाने से अच्छे चलते हैं इसी प्रकार ( घी खाने से ) वाणी भी अच्छी चलती है । शकुनि या बाज़ की तरह बैठकर आहाय पढ़े । देव आपस में यह निश्चय न कर सके कि यह हज़ार मंत्र किस के हों । हर एक ने कहा, "मेरे हों," "मेरे हों ।" जब एक मत न हो सके तो यह ठहरा कि एक दौड़ दौड़ें । जो जीते उसी के यह मंत्र हों । उन्होंने सूर्य्य को जो अग्नि के भी ऊपर है गृहपति और काष्ठ ( सीमा ) नियत किया ❁ । इसीलिये अश्विन शस्त्र का आरंभ इस अग्नि की ऋचा से होता है :- ❁ अर्थात् वह गार्हपत्य अग्नि से चलकर सूर्य्य तक दौड़े । ( २३५ )

२३६ [ चौथी पञ्चिका अग्निर्होता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः, देवना- मृत यो मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा ॥ ( ऋ० ६।१५। १३ ) कुछ लोगों का कहना है कि इस मंत्र से अश्विन-शस्त्र का आरंभ करना चाहिये :- अग्निं मन्ये पितरमग्निमापिमग्निं भ्रातरं सदमित् सखायम् । अग्नेरनीकं बृहतः सपर्य दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य । (ऋ० १०।७।३) उनका कहना है कि "दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य" (मंत्र का चौथा पाद ) इन शब्दों से द्वारा वह यथेष्ट स्थान को पहुँच जायगा । परन्तु यह बात माननीय नहीं है। उन लोगों से कहा कि अगर मंत्र में 'अग्नि' शब्द बार बार आयेगा तो होता आग में गिर पड़ेगा । ऐसा ही हुआ करता है । इसलिये "अग्नि होता गृहपतिः" इससे आरंभ करना चाहिये । इसमें 'गृहपति' और जनिमा ( सन्तान ) शब्द हैं । इससे उसको पूर्ण आयु प्राप्त हो सकती है। जो इस रहस्य को समझता है उसकी आयु पूर्ण होती है । (१) ८—यह जो देवते दौड़ रहे थे उनमें से चलने के बाद अग्नि अपने मुख या लपटों द्वारा आगे था । अश्विन पीछे थे । और वे उससे बोले "हम दोनों जीत जायं"। अग्नि मान गया कि अश्विन शस्त्र में हम को भी भाग मिले । उन्होंने स्वीकार कर लिया और अश्विन-शस्त्र में अग्नि को स्थान दे दिया । इसीलिये अश्विन-शस्त्र में अग्नि के लिये कई मंत्र हैं । अश्विन उषा के पीछे थे । वे उससे बोले, "तू हट जा । हम जीत जायं" वह इस शर्त पर मान गई कि उसका भी भाग लगे । उन्होंने स्वीकार कर लिया और उसके लिये अश्विन- शस्त्र में जगह कर दी । इसीलिये अश्विन-शस्त्र में उषा के लिये कई मंत्र हैं ।

दूसरा अध्याय ] २३७ अश्विन इन्द्र के पीछे चले और कहा, “मघवन् ! हम इस दौड़ में जीतना चाहते हैं।” उनका यह साहस न हुआ कि इन्द्र से कहते “हट जाओ”। इन्द्र ने इस शर्त पर मान लिया कि मुझे भी भाग दो। उन्होंने स्वीकार कर लिया और अश्विन- शस्त्र में इन्द्र को स्थान दिया। इसीलिये अश्विन-शस्त्र में कई मंत्र इन्द्र के हैं। इस प्रकार अश्विन जीत गये और उनको इनाम मिल गया। चूँकि अश्विन जीत गये और उनको इनाम मिला इसलिये इस शस्त्र को अश्विन-शस्त्र कहते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामना पूरी हो जाती है। कुछ लोग पूछते हैं कि जब इस शस्त्र में अग्नि, उषा और इन्द्र के मंत्र हैं तो इसको अश्विन-शस्त्र क्यों कहते हैं। इसका उत्तर यह है कि अश्विन जीत गये। उनको इनाम मिल गया। जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामना पूरी हो जाती है। (२) ९—अग्नि ने दौड़ में अपने रथ में खच्चर (अश्वतरी) जोड़े। दौड़ में अग्नि ने खच्चरियों की योनियाँ जला दीं। इस- लिये उनके सन्तान नहीं होती। उषा लाल गायों के रथ में दौड़ी। इसीलिये उषाकाल में लाल रंग चमकता है। यह उषा का रूप है। इन्द्र ने घोड़े के रथों में दौड़ की। इसलिये क्षत्रियों का रूप यह है कि बहुत कोलाहल हो। यही इंद्र का रूप है। अश्विनों ने गधों के रथ में दौड़ की और जीत गये। और इनाम पा गये। (चूँकि बहुत दौड़ने से थक गये। इसलिये गधों की तेजी जाती रही। और दूध मारा गया और रथ के वाहनों में सबसे कम हो गये। लेकिन अश्विनों ने गधे के वीर्य को शक्ति रहित नहीं किया। इसलिये वाजी अर्थात् गधे में दो