ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें२४० [ चौथी पञ्चिका दिन और रात से शुरू करता है। मैत्रावरुण प्रगाथ को पढ़कर होता यजमान को दिन और रात में स्थापित कर देता है । "सूरचक्षसः" शब्द से सूर्य को नहीं भूलता। यह जो बार्हत प्रगाथ है उससे बृहती को नहीं भूलने पाता । द्यौ और पृथिवी के यह दो मंत्र पढ़ता है :— मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पिपृतां नो भरीमभिः ॥ (ऋ० १।२२।१३) ते हि द्यावा पृथिवी विश्वशम्भुव ऋतावरी रजसो धारयत् कवी । सुजन्मनी धिषणे अन्तरीयते देवो देवी धर्मणा सूर्य्यः शुचिः ॥ (ऋ० १।१६०।१) द्यौ और पृथिवी दो स्थान हैं । पृथिवी यहां और द्यौ वहाँ । द्यावापृथिवी के इन दो मंत्रों को बोलकर वह यजमान को द्यौ और पृथिवी में स्थापित कर देता है । ऊपर जो "देवो देवी धर्मणा सूर्य्यः शुचिः" शब्द आये हैं ( अर्थात् देव और शुचि-सूर्य दो देवियों को पार करता है ) उन से वह सूर्य को नहीं भूलता । इनमें से एक गायत्री है और दूसरा जगती । इन दोनों के मिलने से दो बृहती होते हैं। इस प्रकार वह बृहती को नहीं भूलने पाता । द्विपदों की स्तुति करता है :— विश्वस्य देवीमृचयस्य जन्मनो न यारोषति नग्नभत् "यह जो उत्पन्न हुआ या चलता फिरता जगत है उस सब की शासक देवी न हम पर क्रोध करे, न नाश करने के लिये हमारे पास आवे" ( यह मंत्र संहिता में नहीं है ) । लोग इस अश्विन-शस्त्र को चितैध (चिता का ईंधन कहते हैं। क्योंकि जब होता इस शस्त्र को समाप्त करने को होता है तो निर्ऋति अपना पाश लिये छिपी रहती हैं कि होता की गर्दन में डाल कर उसका नाश कर दे । बृहस्पति ने उसको बचाने के