भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 255

दूसरा अध्याय ] २४१ लिये इस द्विपदा स्तुति का दर्शन किया । यह जो शब्द आये हैं “न यारोषातिनग्मथत्” ( न क्रोध कर, न नाश के लिये देख ) इन शब्दों को कहकर निर्ऋति से पाश छीन लिये और नीचे रख दिये । इसी प्रकार जब होता द्विपदों की स्तुति के मंत्र पढ़ता है तो निर्ऋति के हाथों से पाश छुड़ा लेता है और उनको नीचे रख देता है । और सुरक्षित निकल आता है । पूर्ण आयु की प्राप्ति के लिये । जो इस रहस्य को समझता है वह पूर्ण आयु प्राप्त कर लेता है । मंत्र में जो यह शब्द हैं “मृचयस्य जन्मनः” इनके पाठ से वह सूर्य को नहीं भूलता क्योंकि सूर्य्य चलता सा है ( मर्चयति ) । द्विपद मंत्र का छन्द मनुष्य का छन्द है ( क्योंकि इसके भी दो पाद होते हैं और मनुष्य के भी दो पद ) । इसलिये इसके अन्तर्गत सभी छन्द आ जाते हैं । इस प्रकार होता बृहती को भूलने नहीं पाता । (४) ११—ब्रह्मणस्पति के मंत्र से समाप्त करता है । ब्रह्म बृहस्पति है । वह ब्रह्म में उसको स्थापित करता है । जो पुत्र और पशु की कामना करे वह इस मंत्र से समाप्त करे :— “एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः । बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वय स्याम पतयो रयीणाम्” ॥ ( ऋ० ४।५०।६ ) क्योंकि इस मंत्र के “बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम्” शब्दों के कहने से वह सन्तान, पशु, धन, वीर, वाला हो जाता है । यह जान कर कि इस मंत्र से आरम्भ करना चाहिये । तेज और ब्रह्मवर्चस् की कामना वाला नीचे के मंत्र से आरम्भ करे :— १६