भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

२४२ [ चौथी पञ्चिका बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु । यद् दीदयच्छवस ऋत प्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् । ( ऋ० २।२३।१५ ) 'अति' का अर्थ यह है कि अन्यों की अपेक्षा अधिक ब्रह्म- वर्चस् वाला होता है। "द्युमत्" का अर्थ है ब्रह्मवर्चस् । 'विभाति' का अर्थ है कि ब्रह्मवर्चस् हर जगह चमकता सा है । "यद् दीदयच्छवस ऋत प्रजात" का अर्थ है कि ब्रह्मवर्चस् चमकता है। 'चित्र' का अर्थ है कि ब्रह्मवर्चस् साक्षात् मालूम होता है। जो जो इस रहस्य को समझ कर इस प्रकार समाप्त करता है वह ब्रह्मवर्चसी और ब्रह्मयशसी होता है। इसलिये इस रहस्य को समझने वाले होता को इसी ब्रह्मणस्पति के मंत्र से समाप्त करना चाहिये। ऐसा करने से वह सूर्य्य को नहीं भूलने पाता। तीन बार त्रिष्टुभ् में सभी छन्द आ जाते हैं। इस प्रकार वह बृहती को नहीं भूलता। गायत्री और त्रिष्टुभ् से वषट्कार करे। गायत्री ब्रह्म है और त्रिष्टुभ् वीर्य्य । इस प्रकार ब्रह्म और वीर्य्य को जोड़ता है। जो इस रहस्य को समझ कर गायत्री और त्रिष्टुभ् से वषट्कार करता है वह ब्रह्मवर्चसी और ब्रह्मयशसी होता है। ( त्रिष्टुभ् यह है ):- अश्विना वायुना युवं सुदक्षा नियुद्भिश्न सजोषा युवाना । नासत्या तिरो अह्नयं जुषाणा सोमं पिबतमस्रिधा सुदानू । ( ऋ० ६।५८।७ ) गायत्री यह है :- उभा पिब तमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम् । अविद्रियाभिरूतिभिः । ( ऋ० १।४६।१५ ) गायत्री और विराट् से भी वषट्कार हो सकता है :- गायत्री ब्रह्म है और विराट् अन्न । इस प्रकार वह ब्रह्म को अन्न से जोड़ता है। जो इस रहस्य को समझ कर गायत्री और