ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] २४३ विराट् से वषट्कार करता है वह ब्रह्मवर्चसी और ब्रह्मयशसी होता है और ब्रह्म-अन्न ( शुद्ध अन्न ) खाता है। इसलिये जो इस रहस्य को समझे उसे गायत्री और विराट् से वषट्कार करना चाहिये। विराट् यह है :— प्र वामन्धांसि मद्यान्यस्थुररं गन्तं हविषो वीतये मे। तिरो अ॒र्यो हवनानि श्रुतं नः । (ऋ० ७।६८।२) गायत्री वही है जो ऊपर दी गई। (५) (ऋ० १।४६।१५) १२—इस दिन चतुर्विंश कृत्य करते हैं। यह आरंभ है। इससे संवत्सर का आरंभ होता है और स्तोमों और छन्दों का और देवतों का भी। यदि इस दिन आरंभ न हो तो न छन्द का आरंभ समझा जायगा, न देवतों का। इसीलिये इसका नाम आरंभणीय पड़ा। इसको चतुर्विंश इसलिये कहते हैं कि इसमें चौबीस स्तोम पढ़े जाते हैं। या चौबीस पाख (आधे महीने) होते हैं। इनसे पाखों वाला साल आरंभ होता है। उक्थ्य भी उसी दिन होता है। उक्थ्य पशु हैं। पशुओं की प्राप्ति के लिये यह किया जाता है। इस उक्थ्य में १५ स्तोत्र होते हैं और १५ शस्त्र । ( मिल कर तीस हुये। तीस दिन का ) महीना होता है। इनसे महीनों वाला साल शुरू होता है। ( इस उक्थ्य में ) तीन सौ साठ स्तोत्रिय मंत्र होते हैं। साल में इतने ही दिन होते हैं। इस प्रकार वह दिनों वाले साल का आरंभ करते हैं। कहते हैं कि उस दिन अग्निष्टोम होना चाहिये। अग्निष्टोम संवत्सर है। अग्निष्टोम के सिवाय और किसी ने इस दिन की पवित्रता को या उसके भिन्न भिन्न कृत्यों की पवित्रता को क़ायम नहीं रक्खा।