भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

तीसरा अध्याय ] २५३ “हंसः शुचिषद्” ( प्रकाश में बैठने वाला हंस ) यह सूर्य्य है जो प्रकाश में बैठा हुआ है। “बसुरन्तरिक्ष सद्” वही अन्त- रिक्ष्न में बैठने वाला वसु है। वही “होता वेदिषद्” अर्थात् वेदी में बैठने वाला होता है। वही “अतिथिर्दुरोणसत्” अर्थात् घर में बैठने वाला अतिथि है। वही ‘नृषद्’ मनुष्यों में बैठने वाला है। “वरसद्” अच्छे स्थान पर बैठने वाला है। अर्थात् जिस स्थान् पर बैठ कर यह तपता है वह बहुत अच्छा स्थान है। “ऋतसद्” वह सचाई में बैठा हुआ है। “व्योमसद्” वह आकाश में बैठा हुआ तपता है। वह ‘अब्जा’ जल से उत्पन्न हुआ है। वह प्रातःकाल जलों में से निकलता है, और शाम को जलों में घुस जाता है। वह ‘गोजा’ गौओं से उत्पन्न हुआ। और ‘ऋतजा’ सत्य से उत्पन्न हुआ। ‘अद्रिजा’ पहाड़ से उत्पन्न हुआ है। ‘ऋत्’ अर्थात् सत्य है। सूर्य्य यह सब कुछ है। और यह मंत्र सूर्य्य का प्रत्यक्षतम रूप बतलाने वाला है। इसलिये जहाँ कहीं दूरोहण पढ़ा जाय ‘हंस’ वाले मंत्र के साथ पढ़ा जाय । ॐ ॐ दूरोहण का यह हंस वाला मंत्र सात बार पढ़ना चाहिये। इस प्रकार :- ( १ ) ‘शोंसावोम्’ कहने के पश्चात् पहले पद पद कर के। ( २ ) फिर आधा आधा मंत्र। ( ३ ) फिर तीन तीन पद मिला कर। ( ४ ) फिर पूरा मंत्र लगातार बिना ठहरे हुये। ( ५ ) फिर तीन तीन पद मिला कर। ( ७ ) फिर आधा आधा मंत्र। ( ७ ) फिर पद पद अलग करके। अन्त में ओम् कह कर समाप्त करे।