ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५४ [चौथी पञ्चिका स्वर्ग की इच्छा वाला तार्क्ष्य मंत्र से आरंभ करे :— त्यमूषु वाजिनं देवजूतं सहावानं तरुतारं रथानां । अरिष्टनेमि पृत- नाजमाशुं स्वस्तये तार्क्ष्यमिहा हुवेम ॥ (ऋ० १०।१७८।१) क्योंकि तार्क्ष्य ने मार्ग दिखाया था जब गायत्री सुपर्ण होकर सोम को लाई थी। जैसे कोई खेत जानने वाले को अपना अगुवा बनाले इसी प्रकार तार्क्ष्य मंत्र से ('दूरोहण' को) आरंभ करना है। तार्क्ष्य वह है जो बहता है ( पवन ) और स्वर्ग लोक को ले जाता है। ऊपर के मंत्र का अर्थ :— हम यहां स्वस्ति के लिये बुलावें ("देवजूतं वाजिनं") देव- ताओं से प्रेरित हुये घोड़े को जो ( सहावान ) मजबूत है। ( रथानां तरुतारं ) रथों में शीघ्र चलने वाला । ( अरिष्ट नेमि ) जिसकी नेमि अच्छी है, ( पृतनाजं ) जो लड़ाई में तीव्र है, ( तार्क्ष्य ) जो तेज है।" यह ( पवन ) देवजूत वाजी है। यह सहावान है। वह 'रथानां तरुतारं' है क्योंकि इन लोकों को शीघ्र ही पार कर जाता है, 'स्वस्तये' से होता अपना कल्याण चाहता है, 'इहा हुवेम' से होता उसका आह्वान करता है। इन्द्रस्येव रतिमाजोहुवानाः स्वस्तये नावमिवा रुहेम । उर्वी न पृथ्वी बहुले गभीरे मा वामेतौ मा परेतौ रिषाम ॥ (ऋ० १०।१७८।२) “इन्द्र के लिये जैसे उसी प्रकार 'तार्क्ष्य' के लिये बार-बार आहुति देते हुये हम नाव के समान चीजों में चढ़ें। पृथ्वी हमारे लिये विस्तृत हो, बहुत बड़े और गहरे तुम दोनों ( आकाश और पृथिवी ) में चलते हुये हम दुःख न उठावें।” 'स्वस्तये' शब्द से कल्याण चाहता है। 'नावमिवारुहेम' से वह तार्क्ष्य में चढ़ता है, स्वर्गलोक को प्राप्ति उसके भोग और वहां की संपत्ति के लिये। मंत्र के अन्तिम पद से तात्पर्य यह