भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

चौथा अध्याय २३—प्रजापति ने चाहा कि मैं संतान उत्पन्न करके बहुत हो जाऊँ। उसने तप तपा। उसने तपों को तप कर उसने अपने अंगों और प्राणों में द्वादशाह को देखा। उसने अपने अंगों और प्राणों में से द्वादशाह को निकाला। और उसको बारह गुना कर दिया। उसको उसने ले लिया और उससे यज्ञ किया। तब वह प्रजापति हुआ। प्रजाओं और पशुओं द्वारा उत्पन्न हुआ। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजाओं और पशुओं द्वारा अपने आपको उत्पन्न करता है। उसने चाहा कि कैसे गायत्री द्वारा सब जगहों में द्वादशाह में समृद्धि को प्राप्त होऊँ। द्वादशाह के पूर्व में गायत्री तेज रूप में थी, मध्य में छन्दरूप में और अन्त में अक्षर रूप में। इस प्रकार द्वादशाह को गायत्री से व्यापक करके उसने समृद्धि प्राप्त की। जो इस रहस्य को समझता है वह सब समृद्धि को प्राप्त होता है। जो गायत्री को पंखों वाली, आँखों वाली, ज्योति वाली, प्रकाशवाली जानता है, वह पंखों वाली, आँखों वाली, ज्योति ( २५८ )