भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

चौथा अध्याय ] २५९ वाली और प्रकाश वाली गायत्री के द्वारा स्वर्ग को प्राप्त हो जाता है । यह जो द्वादशाह है वह पक्षिणी, चक्षुष्मती, ज्योतिष्मती और भास्वती गायत्री ही है। इसके दो जो अतिरात्र हैं वे दो पंख हैं । जो दो अग्निष्टोम हैं वे दो आँखें हैं । जो मध्य के आठ उक्थ्य हैं वे आत्मा हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह पक्षवाली, चक्षुवाली, ज्योतिवाली और भास्वती गायत्री द्वारा स्वर्गलोक को जाता है । (१) २४—द्वादशाह में तीन त्र्यह ( त्रि = तीन, अह = दिन ) होते हैं ( इस प्रकार ९ हुये ) और एक दशवीं और दो अतिरात्र ( कुल १२ दिन हो गये ) । द्वादशाह ( बारह दिनों ) में दीक्षित होकर यज्ञिय ( यज्ञ करने योग्य ) बनता है । बारह रातों में उपसद् करता है । और इससे वह अपने शरीर को शुद्ध कर लेता है । जो इस रहस्य को समझ लेता है वह द्वादशाह में फिर उत्पन्न होकर और शरीर को शुद्ध करके शुद्ध और पवित्र होकर देवता में मिल जाता है । द्वादशाह ३६ दिन का होता है । बृहती में ३६ अक्षर होते हैं । द्वादशाह बृहती का अयन ( स्थान ) है । बृहती से दोनों ने इन (सब) लोकों को पाया । इससे यह लोक जीता, इससे अन्तरिक्ष, इससे द्यौलोक । चार से चार दिशा और दो से इस संसार में प्रतिष्ठा । जो यह रहस्य समझता है उसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है । इस प्रकार आक्षेप होता है कि इसको बृहतीं क्यों कहते हैं जब अन्य छन्द इससे बड़े हैं और प्रबल भी हैं । इसका उत्तर यह है कि इससे देवों ने सब लोकों को जीता था । दस अक्षर से यह लोक, दस से अन्तरिक्ष, दस से द्यौलोक, चार से चार